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Sunday, May 12, 2024

Raj Comics Forums (2006-2012)

 Sanjay Singh - "इस अप्रैल फारम को बंद हुए पूरे 12 साल हो गए। फेसबुक के भारत मे लोकप्रिय होने से पहले फारम पर राज कामिक्स के फैन्स विभिन्न विषयों पर विचार-विमर्श करते थे। साथ ही कितने ही लोग इस के जरिए आपस मे जुडे और फिर उनकी दोस्ती कामिक्सों पर चर्चा तक ही सीमित ना रही। मैं भी उन्हीं मे से एक हूं।

फारम की शुरुआत 2006 मे हूई थी। उस समय प्रकाशित हुई कामिक्सों मे ग्रीन पेज के अंदर फारम से जुडने के लिए भी कहा गया था। कुछ कामिक्सों मे फारम की पोस्टस भी डाली गई। वर्तमान* मे आप फारम पोस्ट्स को देख सकते है। उस समय जो फैन/पाठक फारम से जुडे (1st Generation) वो सबसे ज्यादा भाग्यशाली रहे। क्योंकि उनके विचार और सुझाव पर राज कामिक्स ने काम भी किया। इसका उदाहरण आतंकहर्ता नागराज की वापिसी है। इसका सुझाव भी एक फैन ने ही दिया था।

मैंने फारम अगस्त 2008 मे ज्वाईन किया था (2nd Generation)। तब तक बहुत सारे विष्यों पर चर्चा हो चुकी थी। फिर भी अगले 3-4 साल तक फारम पर सक्रिय रहा। लेकिन 2011 से बहुत से कामिक फैन फेसबुक यूज करने लगे। और फेसबुक पर ही अब कामिक ग्रुप पर सारी बाते होने लगी। साथ ही 2008 से राज कामिक्स ने भी फारम यूजर्स के सुझावों और बातो को ज्यादा प्राथमिक्ता देनी बंद कर दी थी। अब ज्यादातर केज्यूल डिस्कशन ही हो रहे थे जो कभी-कभी झगडे का रूप भी ले लेते थे।

अप्रैल 2012 मे फारम को बंद कर दिया। शुरु मे राज कामिक्स टीम की तरफ से कहा गया की ये बंद नही हुआ है। वेबसाईट मे कुछ बदलाव किए जा रहे है और ये दोबार से शुरू हो जाएगा। लेकिन उसी महीनें मे ये पक्का हो गया कि फारम अव बंद हो गया। जून 2012 मे मैं कुछ कामिक फैन्स के साथ संजय जी से मिलने बुराडी गया। वहां पर हमने फारम को बंद करने के बारे मे भी बात करी। इस पर संजय जी ने कहा कि मनीष जी तो इसे 2010 मे ही बंद कर देना चाहते थे। हमने जैसे-तैसे इसे 2 साल तक और चलाया। फारम बंद करने की वजह यही थी कि अब लोग फेसबुक पर ही सब बाते कर लेते है। फारम पर ट्रैफीक कम हो गया था। ज्यादातर डिस्कशन अक्सर आफ टापिक हो जाते थे। और फिर इसे देखने के लिए भी लोगों की जरूरत रहती थी। वो भी अब कम ही उपलब्ध रह पाते थे। इन्ही सब कारणों के चलते इसे बंद करना पडा। फिर शायद साल के आखिरी मे एक नया फारम आया। लेकिन इसमे हमारे पुराने पोस्ट नही थे। ये कुछ ही समय मे बंद भी हो गया।

जो लोग फारम से जुडे थे, खासतौर पर जो अंत तक जुडे रहे, उनके लिए फारम का जाना ऐसा ही था जैसे उन्होंने अपने जीवन का एक हिस्सा खो दिया हो। वो लोग उससे भावनात्मक रुप से जुडे हुए थे। फारम पर पोस्ट्स के अलावा, ब्लाग, स्टोरी, इत्यादी और भी चीजे थी जहां फारम मैम्बर निरंतर अपना योग्दान देते रहते थे। ये सब एक झटके मे ही चला गया। और किसी को बैकअप लेने का मौका भी नही दिया गया। मैं किसी तरह अभी फारम की पुरानी पोस्ट्स को वैसे ही देख लेता हूं। ये इमेज भी इसे ही देख रहा हूं। ये 14 अप्रैल 2012 की है। तब फारम बंद हो गया था और उसे ओपन करने ये मैसेज आता था।

'This board has no forums'

* वर्तमान के रिप्रिंट मे आपको फारम पोस्टस देखने को नही मिलेगी। सिर्फ ओरिजिनल प्रिंट (2006) मे ही ये उपलब्ध है।

PS: 1st and 2nd Generation मैने अपनी समझ से परिभाषित किए है। कृपा अन्यथा ना ले।"

Monday, April 22, 2024

कॉमिक्स के पार्सल... - शिवांश भटनागर

शिवांश भटनागर के विचार - "सच में। क्या दिन थे वो भी जब ऐसे हरे पीले नीले पार्सल भारतीय डाक से घर पर आया करते थे। एक अलग ही फीलिंग थी, राजकॉमिक्स साइट से मनपसंद कॉमिक्स की छटनी करना, उन्हें ऑर्डर करना फिर पलकें बिछा कर उनका इंतजार करना। मैं हर सेट राजकॉमिक्स साइट से ही ऑर्डर करता था, क्योंकि तब कोई दूसरा ऑनलाइन सेलर भी नही था। मैने अपने आप से पहले बार अगर ऑनलाइन पेमेंट करके  कुछ मंगाया तो वो कॉमिक्स ही थी। 2009 में पहली बार ऑर्डर किया जिसमें अमेजिंग फ्रेंड्स ऑफ नागराज की कॉमिक्स थी योद्धा के स्वर्ग पात्र सीरीज के साथ जो की मैने चाचा के क्रेडिट कार्ड से मंगाई थी। उसके बाद कई सालो तक मनी ऑर्डर से कॉमिक्स मंगाई, ये भी एक अलग ही कारनामा था, पोस्ट ऑफिस जाके मनी ऑर्डर करना और फिर उसकी रसीद राजकॉमिक्स को भेजना जिसके बाद वो ऑर्डर स्टेटस कंफर्म कर देते थे। 2013 तक ऐसे किया और उसके बाद बैंक अकाउंट खुलवा कर खुदका कार्ड लिया और तबसे ऑनलाइन पेमेंट करना शुरू किया। ये सिलसिला 2019 तक चला बालचरित की लास्ट कॉमिक एंड गेम के प्री ऑर्डर तक। उसके बाद ये साइट हमेशा हमेशा के लिए बंद हो गई पर वो यादें, ऑर्डर शिप होने के बाद डाकिए की राह देखने की, जीवन भर के लिए रह गईं हैं।"

Sunday, September 1, 2019

Nanhe Samrat Memories


Artist Sukhwant Kalsi - "'नन्हे सम्राट' का पहला विज्ञापन। 'क्रिकेट सम्राट' में छपे इस विज्ञापन को बनाते समय मैंने अनुपम सिन्हा और जावेद द्वारा बनाये गये चित्रों को खास तौर से शामिल किया था। मेरा "मूर्खिस्तान" इसी अंक से शुरु हुआ था।"

Wednesday, June 20, 2018

Mr. Abhishek Rana Borah‎ on Pralayanka (Mamta Pathak) - Parmanu Series, Shakti Series


Abhishek Rana Borah‎ 

"दोस्तों, आज में आप सबसे राज कॉमिक्स कि अपने सबसे पसंदीदा #सहायक_किरदार (स्त्री) #प्रलयंका के बारे कुछ पूछना एवं बताना चाहता हू्ं ৷
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उससे पहले यह बता देना अच्छा रहेगा कि मैं सन 1993 से 2003 तक राज कॉमिक्स का नियमित पाठक था ৷ 2003 से 2005 तक एक - दो कॉमिक्स कभी कभार पढ़ने का सिलसिला ज़ारी रहा और उसके पश्चात अब तक (अनियमित रुप से) मेरा ध्यान केवल पुरानी कॉमिक्सों के प्रति ही रहा है ৷ 90 के दशक मे जो कॉमिक्सें मुझसे छूट गयीं थीं उनको प्राप्त करने कि जद्दोजहद अभी भी चल रही है ৷ 
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बहरहाल बात करते है प्रलयंका उर्फ #ममता_पाठक कि৷
मुझे यह तो पता नहीं कि परमाणु के किस कॉमिक्स में वह प्रथम बार नज़र आई , लेकिन अगर मैं गलत नहीं हू्ं तो #उड़ने_कि_क्षमता रखने वाली वह पहली (सहायक) (महा)नायिका है ৷ परमाणु के साथ कंधों से कंधा मिलाकर खलनायकों से लड़ने वाली प्रलयंका एक आत्मनिर्भर एवं सशक्त महिला है ৷ केवल एक नायिका के रुप में ही नहीं , बल्कि एक आम महिला के रुप मे भी वह एक साहसी पेशेवर #पत्रकार है ৷ वह ना तो कहीं कि राजकुमारी है , ना तो किसी पुलिस कमिश्नर या अपराधी सरगना कि बेटी है और ना ही कि कोई एसी महिला है जिसके साथ कुछ गलत होने के कारण वह एक बदला लेने वाली नायिका बन गई हो ৷ वह बस एक साफ मन कि सशक्त महिला है৷
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व्यक्तिगत तौर पर मुझे "ममता पाठक" - यह नाम भी बडा भाता है जो महिलाओं कि एक एसे गुण - ममता - को दर्शाती है हम पुरुषों मे कभी भी एक महिला के समान नहीं हो सकती है ৷ यह नाम श्वेता, नताशा, भारती, ऋचा, मोनिका, सोनिका, शीना इत्यादि से बहुत ज्यादा आत्मीयता का बोध कराती है ৷
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कहानियों में देखा जाए तो जिस तरह से विनय कुमार प्रोफेसर कि वैज्ञानिक शक्तियों से लैस पीली-हरी पोशाक के बदौलत अपनी शक्तियां प्राप्त करता है , ठीक उसी तरह , ममता पाठक यह प्राप्त करती है अपने गुलाबी-पीली पोशाक से ৷ अंतर यह है कि परमाणु के नकाब कि जगह प्रलयंका एक बिना आंखों कि पुतलीयों तथा लाल केशयुक्त मुखौटा पहनती है ৷ हालांकि यह मेरा अनुमान मात्र ही है ৷ शायद कभी भी मुखौटा पहनते समय प्रलयंका को दिखाया नहीं गया है ৷
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पर सवाल ये बनता है कि आखिर क्यों ममता पाठक प्रलयंका बनने के लिए चुनी गई? जिस तरह से #रिवॉलवर को परमाणु कि उत्पत्ति कथा माना जाता है , क्या उस तरह से प्रलयंका कि कोई उत्पत्ति कथा है? हम यह तो जानते हैं कि ममता, #शक्ति कि मानवीय रुप #चंदा कि ननद है ৷ लेकिन उसके परे और क्या है? 
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जिस तरह से सोनिका उर्फ काली विधवा को डोगा के सिवाय अन्य महानायकों के साथ दिखाया गया है, क्या कभी प्रलयंका को कभी किसी और के साथ या चंडीका कि तरह अपनी एकाकी कॉमिक्स मिली है ? (मैं आज कि कॉमिक्सों के बारे मे नहीं कह रहा जहां #मल्टीस्टाररों कि भरमार है)
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सन 1996 मे #अब_मरेगा_परमाणु के बाद से प्रलयंका परमाणु के कॉमिक्सों मे धीरे धीरे कम नज़र आने लगी ৷ शायद #बम सीरीज़ के बाद #शीना के रुप मे परमाणु को पहली बार मिली एक भावी प्रेमीका को जगह देने के लिए एसा किया गया था ৷ हालांकि ममता पाठक के रुप में वह कम से कम 2001-02 तक नज़र आई थी ৷ शायद #परमाणु_पागल_है में मैने उसे आखिरी बार देखा था ৷
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तो दोस्तों, आप भी प्रलयंका के बारे मे कुछ बताए ৷ उसकी उत्पत्ति, पहली कॉमिक्स, आखिरी कॉमिक्स, सबसे बेहतरीन कॉमिक्स , परमाणु / विनय से उसकी दोस्ती और क्यों वह दोस्ती कभी परस्पर प्रेम मे नहीं बदली? इन सबके प्रामाणिक कारण अथवा अटकलें - कुछ भी...
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मैने दो रोज़ पहले हुई Raj Comics एप्प सेल में नयी पुरानी कुल 114 कॉमिक्स खरीदी है ৷ इनमें से काफ़ी परमाणु कि पुरानी वाली है तथा काफ़ी सारे नये मल्टीस्टार भी हैं ৷ देखते है कहीं इनमें से किसी मेरे इन सवालों का जवाब मिलता है या नहीं ৷
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यहां तक पढ़ने हेतु धन्यवाद ৷ :)"
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Monday, September 18, 2017

Comics Memories (Deepak)

Courtesy - Mr. Deepak Jangra, Group - Comics Fans Society

मित्रों जब मैं छोटा था तब मेरे पिताजी हर रविवार को दैनिक ट्रिब्यून अखबार लेकर आते थे। उस अखबार में एक 4 रविवारीय पृष्ठ होते थे। उन्ही में से एक पृष्ठ पर डायमण्ड कॉमिक्स के पात्र रमन की एक कहानी होती थी। कॉमिक्स से सर्वप्रथम परिचय मेरा इसी माध्यम से हुआ। हमारे परिवार में मेरे चाचा जी भी कॉमिक्स पढ़ते थे जो की आज भी मुझसे लेकर पढ़ते हैं। उन्ही की लाई हुई 2 कॉमिक्स घर पर पड़ी रहती थी जिनके नाम मुझे अबतक याद हैं दोनों मनोज कॉमिक्स थी। एक थी हवलदार बहादुर और चिन चिन पोटली और दूसरी थी अजगर का संसार।

मुझे आज भी याद है की जब अजगर का संसार कॉमिक्स के कवर पृष्ठ के अंदर की ओर टोटान की आगामी कॉमिक्स का कवर छपा होता था जिसमे टोटान को तो बांध रखा होता है और उसके सामने एक मकड़ी जैसा प्राणी होता है, ईसके अलावा और भी भुतहा चित्र होते हैं, उन चित्रों को जब भी मैं देखता था तब मुझे एक अलग ही दुनिया का, एक अलग ही संसार का अहसास होता था। यकीनन वो कॉमिक्स का ही संसार था, कॉमिक्स की ही दुनिया थी वो। उपरोक्त दोनों कॉमिक्स में से मैने हवलदार बहादुर और चिन चिन पोटली पढ़ी थी। उस कॉमिक्स की कहानी के मुख्य बिंदु आज भी मुझे याद हैं। बेदी जी द्वारा किया गया चित्रांकन, उटपटांग चेहरे और उन पर की गई अलग अलग रंगों से कलरिंग ने इस कदर दिलोदिमाग पर अपनी छाप छोड़ी थी की आज तक मैं उन्हें भूल नही पाया हूँ। मेरे कॉमिक्स प्रेम के प्रति मेरे घरवालों का जो नजरिया था वो बाकि कॉमिक्स प्रेमियों से अलग नही था। यानि की नजरिया नकारात्मक था। घरवालों की नजर में कॉमिक्स एक समय को बर्बाद करने वाली और पढ़ाई से दूर ले जाने वाली चीज थी। घरवालों के इसी नजरिये के कारण ही कई बार कॉमिक्स छुप कर पढ़नी पड़ती थी और छुपाकर रखनी पड़ती थी। कई बार घरवालों मेरी कई कॉमिक्स जब्त भी की जो की फिर कभी भी मुझे प्राप्त नही हुई। अब घरवालों का नजरिया पहले जैसा नही है यही कारण है मेरा कॉमिक्स कलेक्शन घर पर सुरक्षित है।

कॉमिक्स कलेक्शन की अगर बात की जाए तो बचपन में सिर्फ कॉमिक्स पढ़ने पर ही जोर दिया था मैने, क्योंकि उस समय उतने पैसे नही होते थे की अपना कलेक्शन किया जाए। फिर बीच में मैं कॉमिक्स से थोड़ा दूर हो गया था। 2014 में मैने कलेक्शन फिर से शुरू किया। मेरी पसन्दीदा कॉमिक्स कम्पनी की अगर बात की जाए तो मुझे अब तक प्रकाशित कॉमिक्स के आधार पर मनोज और राज ही सबसे अच्छी लगती हैं। राज कॉमिक्स को मैं पसन्द करता हूँ सुपरहीरोज, थ्रिल हॉरर सस्पेंस, जनरल कॉमिक्स के कारण और मनोज कॉमिक्स को उनकी नॉन हीरोज कहानियों और हवलदार बहादुर, क्रुकबांड आदि कॉमेडी करेक्टर्स के कारण। मेरे कॉमिक्स कलेक्शन में मुझे कॉमिक्स की संख्या तो पता नही है क्योंकि गिने हुये काफी दिन हो गए हैं फिर भी इतना मैं कह सकता हूँ की मेरे कलेक्शन में 1200 से ज़्यादा कॉमिक्स हैं। आज कॉमिक्स संस्कृति की जो हालत है वो उतनी अच्छी तो नही है जितनी पहले होती थी। पाठक बहुत कम हो गए हैं। बिक्री भी उसी अनुपात में घटी है। मनोज, तुलसी आदि कम्पनियाँ बन्द हो चुकी हैं। पाइरेसी ने भी कॉमिक्स इंडस्ट्री का काफी नुकसान किया है। कॉमिक्स संस्कृति के इस हाल के लिये कॉमिक्स कम्पनियों के मालिक लोग भी उत्तरदायी हैं जो वो समय के साथ नही चले। अगर समय के साथ वो कॉमिक्स को कागज के पन्नों से निकाल कर छोटे और बड़े पर्दे पर लेकर जाते तो कॉमिक्स संस्कृति की ये हालत नही होती। वैसे अभी भी देर नही हुई है। हमें आभारी होना चाहिये मित्रों राज कॉमिक्स का जो वो आज भी पाठकों की कम संख्या होने के बाद भी कॉमिक्स का प्रकाशन कर रहे हैं। और अब तो उन्होंने app बनाकर टेकनोलॉजी के साथ भी कदम मिलाकर चलना शुरू कर दिया है। जल्द ही YouTube पर हमें आदमखोर हत्यारा कॉमिक्स पर आधारित फ़िल्म आदमखोर भी देखने को मिलने वाली है। आशा करता हूँ की राज कॉमिक्स अपने इन प्रयासों से भारत में कॉमिक्स संस्कृति वही समृद्धि और वही लोकप्रियता दिलाने में सफल हो जाएगी जो कभी पहले होती थी, शायद समृद्धि और लोकप्रियता पहले से भी ज़्यादा हो जाए। हमे भी राज कॉमिक्स का सहयोग करना चाहिये। कॉमिक्स संस्कृति को समृद्ध बनाने के लिये हमे पाइरेसी का विरोध करना चाहिये और कॉमिक्स हमेशा खुद भी खरीद कर पढ़नी चाहिये और दूसरों को भी खरीद कर पढ़ने के लिये प्रेरित करना चाहिये।

Sunday, September 17, 2017

Memories (Mr. Vikas Das)


मैँ अगर पिछे मुड कर देखता हूँ तो अाज के दौर के मुकाबले में ९० का दशक मेरे जीवन का गोल्डन टाईम था, ऐक शानदार दौर जो मेरे समकालिन मित्रो ने भी जीया होगा....नब्बै के दशक मे चार चीजे आम तौर से प्रसिद्ध थी पतंग बाजी कबूतर बाजी,क्रिकेट के प्रति दिवानगी (मार्टिन क्रो, मार्क ग्रैटबैच,इमरान खान,कपील देव,रिचर्ड हैडली,इयान बाथम, डेसमंड़ हैंस आदि नाम छाया रहता था) छज्जे की आशिकी (बडे भाईयो को देखता था मोबाईल न होने के कारण हम लव लैटर सप्लायर का काम करते थे) और कॉमिक्स का क्रैज ( चाचा चौधरी राम रहिम,फौलादी सिंह काला प्रेत,शेरा,शाका पुरे रंग मे थे)....बस यही दौर था जब मेरा कॉमिक्स की दुनिया मे प्रवेश हुआ....

मुझे आज भी याद है वह दिन जब गर्मियो की छुट्टिया चल रही थी और मै अपनी बुआ के यहा "आसाम" मे था २ साल वहाँ रहने के बाद (१९८८मे वहाँ चला गया था मात्र ६ साल की आयु मे) ऐसी जीद पकडी खाना पीना छोड दिया की घर जाना है थक हार कर दादा (बंगालियो मे बडे भाई को दादा बोलते है) मुझे रुड़की ले आऐ 
रुड़की आने के करीब हफ्ता भर ही बीता होगा की ऐक रात मेरा सबसे बडा भाई प्रणब कॉमिक्स लाया जो उसने रात को पढ़ी, सुबह करीब ५ बजे कॉमिक्स पर मेरी पडी तो उतसुक्ता वश मैने पढ़नी चाही लेकिन आसाम मे रहने के कारण अंग्रैजी और बंगाली,असमिया मे पारंगत हो चुका था हिन्दी पढने मे कठिनाई होने लगी थी तो मेरे से बडे भाई पंकज ने स्टोरी पढ़नी शुरु की और मै सुनने लगा भाई क्या बवाल स्टोरी और हंस हंस कर लोट पोट करने वाली कहानी थी वह कॉमिक्स ही मेरे जीवन की प्रथम कॉमिक्स थी जो मैने पढ़ी तो नही लेकिन इसे पढ़ी हुई ही मानता हुँ! और वह कॉमिक्स थी "बांकेलाल और मुर्दा शैतान" बस इस कॉमिक्स के बाद तो मुझे कॉमिक्स पढ़ने का ऐसा चस्का लगा की छुटे नही छुटता था....नागराज की पहली कॉमिक्स जो मेरे हाथो मे आयी थी वह थी "नागराज की कब्र" नागराज की इस कॉमिक्स के बाद नागराज को और जानने की इच्छा हुई तो मैने वाकई में नागराज की कब्र ही खोद दी फिर तो नागराज का लगभग सारा कलैक्श इक्कठा कर लिया था वह दौर सिर्फ राज कॉमिक्स का ही नही था वह समय कॉमिक्स का गोल्डन टाईम था लगभग हर प्रकार की ऐडिशन की कॉमिक्स मैने पढी डायमंड,तुलसी,मनोज,दुर्गा,फोर्ट,गोयल,चुन्नू,राधा, किंग,नूतन ,पवन आदि आदि लगभग सभी कॉमिक्स पढी मेरे पसंदिदा कॉमिक्स करैक्टरो की लिस्ट हमेशा ही लंबी रही है क्योकी मैने हर तरह की कॉमिक्स पढी ! लेकिन मै हमेशा नागराज का दिवान रहा आंठवीं तक नागराज की तरह बालो स्टाईल बना स्कुल जाया करता था कई बार सुभाष सर और नरेन्द्र सर के रैपटे खाऐ पर क्या मजाल तो बाल का स्टाईल भी बिगडने दिया हो....स्कुल की किताबो के बीच में कॉमिक्स छिपाने का तरिका तो सिर्फ मुझे ही मालुम था जो अच्छो अच्छो के पकड़ मे नही आता था....

ऐक दौर मे राज कॉमिक्स ने कई प्रतियोगिता भी जारी की जिसमे मैने और मेरे भाई ने कई ईनाम की कब्जाऐ...
जिसमे से ऐक प्रतियोगिता मे मे राज कॉमिक्स ने "डोगा" की कॉमिक्स का कोई कॉमिक्स टाईटल का नाम लिख कर भेजने को कहाँ था....जिसमे से मैने दो टाईटल भेजे थे जिन पर राज कॉमिक्स वालो ने डोगा की कॉमिक्स भी छापी और वह दो कॉमिक्स थी "आखिरी गोली" और " झबरा" लेकिन तब छोटा होने के कारण चिट्ठी कैसे लिखते पोस्ट कैसे करते है का पता नही था तो मेरे भाई पंकज ने अपने नाम से पोस्ट कर दिया तो कॉमिक्स के लास्ट के पन्ने पर पंकज दास का नाम छपा और मैं मन मसोस कर रह गया हाँ ईनाम में ऐक पर्स और फाईटर टोड्स का ऐक मनी बैग मिला था जो सदैव मेरे कब्जे मे रहा अभी कुछ माह पुर्व माँ का देहांत होने पर जब माँ का बक्सा खोला तो फाईटर टोड्स का मनी बैग मिला तो वह पुरा काल मेरी आँखो के आगे घुम गया.......लेकिन अब वह रस नही रहा कॉमिक्स जगत अपनी अंतिम साँसे गिन रहा है यह सोच कर ही बदन पर सिरहन दौड जाती है....कभी रुड़की की किसी भी गली मे निकल जाते थे तो परचुन की दुकान में भी कॉमिक्स टंगी दिखाई दे जाती थी अब न कॉमिक्स है न पढ़ने वाले बच्चे.....अब जो थोड़ी बहुत कॉमिक्स छपती है उस के अंतिम पीड़ी ही हम है. लिखने को बहुत कुछ है लेकिन अब थक गया हुँ....
शायद मेरे समकालिन मित्रो की यही कहानी होगी

Thursday, April 13, 2017

Interview with Superfan Supratim Saha

नागपुर में रह रहे सुप्रतिम साहा का नाम भारतीय कॉमिक्स प्रेमियों के लिए नया नहीं है। सुप्रतिम भारत के बड़े कॉमिक्स कलेक्टर्स में से एक हैं, जो अपने शौक के लिए जगह-जगह घूम चुके हैं। कहना अतिश्योक्ति नहीं, ऐसे सूपरफैंस की वजह से ही भारतीय कॉमिक्स उद्योग अभी तक चल रहा है। पहले कुछ कॉमिक कम्युनिटीज़ में इनका अभूतपूर्व योगदान रहा और समय के साथ ये अपने काम में व्यस्त हो गए। हालांकि, अब भी कुछ कॉमिक्स ग्रुप पर सुप्रतिम दिख जाते हैं। ये मृदुभाषी और सादा जीवन व्यतीत करने में विश्वास करते हैं, इनके बात करने और वाक्य गढ़ने का तरीका मुझे बहुत भाता है इसलिए साक्षात्कार के जवाब में मेल से भेजे इनके जवाबों को जस का तस रखा है। 

अपने बारे में कुछ बताएं?
सुप्रतिम - 80 के दशक में भारत के पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा में मेरा जनम हुआ। मैने अपनी स्कूलिंग अगरतला शहर से की। मैने इंजिनियरिंग की नागपुर शहर से और बॅंगलुर शहर मे कुछ टाइम जॉब करने के बाद मैने मास्टर्स की चेन्नई शहर मे, आज मैं नागपुर के एक कॉलेज मे वाइस प्रिन्सिपल के पद पे काम कर रहा हू. आज भी मैं रेगुलार कॉमिकस खरीदता हू और पढ़ता हु्। मुझे मालूम हैं मेरा यह जुड़ाव कॉमिक्स के साथ हमेशा  रहेगा. इस सफ़र मे मैं अपने कुछ दोस्तो का नाम लेना चाहूँगा जिन्होने हमेशा मेरा साथ निभाया, बंटी फ्रॉम कोलकाता, संजय आकाश  दिल्ली से, गुरप्रीत पटियाला से, और बहत सारे दोस्त, वरुण ,मोहित, महफूज़ ,ज़हीर,विनय,अजय ढिल्लों  जिन्हे मैं ऑनलाइन मिला और इन सब से भी मेरी काफ़ी अच्छी दोस्ती हैं। सबके नाम शायद मैं यहा लिख नही पाया पर  मैं सबका आभारी हूँ जिन्होने इस सफ़र पे मेरा साथ निभाया। 

कॉमिक्स कलेक्शन का आपका सफर कैसे शुरू हुआ?
सुप्रतिम - मेरे कॉमिक्स पढ़ने की अगर बात करे तो ये शुरुवात हुई थी 1991-92 के आसपास। उन दिनों मैं क्वार्टर में रहता था और हर एक  घर से बटोर के जो कॉमिक्स मुझे मिलते थे उनमे से ज़्यादा तर या तो टिनटिन होते थे या फिर इंद्रजाल कॉमिक्स।  हिंदी कॉमिक इंडस्ट्री से मैं जुड़ा 1994 में जब मेरे एक राजस्थानी मित्र ने मुझे दो कॉमिक्स दी, वो दो कॉमिक्स थे डॉ नो और उड़ती मौत। राज कॉमिक्स और साथ ही अन्य हिंदी  कॉमिक्स के साथ मैं इन्ही दो कॉमिक्स की वजह से जुड़ा। 

अब तक कॉमिक्स के लिए कहाँ-कहाँ घूम चुके हैं?
सुप्रतिम - कॉमिक्स के लिए ट्रेवल करना मैंने शुरू किया सन 2009 से, यह वो समय था जब मैं बैंगलोर में था.बैंगलोर के अनिल बुक शॉप से बहत सारी कॉमिक्स मैंने रिकलेक्ट की.इसको छोड़के मैंने सबसे ज़्यादा कॉमिक्स कलेक्ट की नागपुर से। इस शहर ने मुझे ऑलमोस्ट 1500 + कॉमिक्स दी जिनमे मैक्सिमम दुर्लभ कॉमिक्स थे। इन 8 सालो में मैंने दिल्ली, नागपुर, कोलकाता, हैदराबाद, बैंगलोर, चेन्नई, पटियाला, अम्बाला, अगरतला जैसे शहरो से भी कॉमिक्स ली। दिल्ली शहर में दरीबा कलां के गोडाउन  से भी मैंने 1000+ कॉमिक्स ली।  इन दो शहर को छोड़के हैदराबाद शहर में भी मुझे 300+ विंटेज डायमंड कॉमिक्स मिलें। ऐसी कॉमिक्स जो की 35 साल से भी अधिक पुराने हैं,जैसे की लंबू मोटू ,फौलादी सिंह ,महाबली शाका ,मामा भांजा और वॉर सीरीज वाली कॉमिक्स। इन सब को छोड़के मेरे पास बंगाली कॉमिक्स भी है भारी संख्या में, करीबन 500 ,जिनमे पिछले 60-80 साल पुराने कॉमिक्स भी हैं। मैं आज भीं रेगुलर कॉमिक्स लेता हु हिंदी बंगाली इंग्लिश में। 

पहले के माहौल और अब में क्या अंतर दिखते हैं आपको?
सुप्रतिम - पहले के माहौल में कॉमिक्स एक कल्चर हुआ करता  था, आजकल कॉमिक्स तो दूर की बात हैं किताबों को पढ़ने के लिए भी पेरेंट्स बच्चो को प्रोत्साहित नहीं करते।  विडियो गेम्स केबल टीवी आदि तो मेरे बचपन में भी आराम से उपलब्ध थे ,पर इन सबके बावजूद अगर हर दिन खेलने नहीं गए, तैराकी नहीं की तो घर पे डांट पड़ती थी। आजकल कॉमिक्स,खासकर के कोई भी "रीजनल " फ्लेवर की कॉमिकस को पढ़ना लोगो के सामने खुदको हास्यास्पद करने जैसा हैं। यही वजह हैं की सिर्फ वही लोग देसी कामिक्से पढ़ते हैं जिनमे रियल पैशन हैं, वरना मंगा और वेस्टर्न कॉमिक्स को ही सीरियस कॉमिक्स समझने और ज़ाहिर करने वालो की भी कमी नहीं हैं। एक कॉमिक बुक फैन होने के नाते मुझे सभी कामिक्से देसी  या विदेसी  अच्छे  लगते  है पर भाषा के नाम पे यह भेदभाव आज बहत ज़्यादा प्रभावशाली हैं। 

अपने शहर के बारे में बताएं।
सुप्रतिम - मेरा जन्म भारत के पूर्वोत्तर मे स्थित अगरतला शहर मे हुआ। गौहाटी के बाद ये पूर्वोत्तर के सात राज्यो मे दूसरा प्रमुख शहर भी हैं। बॉर्डर से सटे होने की वजह से यहा बीएसएफ भी कार्यरत हैं जिनमे से काफ़ी लोग हिन्दी भाषी है। साथ ही साथ ओ एन जी सी होने के कारण से हिन्दी भाषी लोग काफ़ी मात्रा मे मौजूद भी है। ज़ाहिर सी बात हैं की इस वजह से हिन्दी कॉमिक्स शुरू से ही यहा रहते लोगो का मनोरंजन करती आ रही हैं. समय के साथ साथ हिन्दी कॉमिक्स का क्रेज़ यहा काफ़ी कम हो चुका हैं पर आज भी मैं घर जाता हू तो भूले भटके एक आधा दुकान मे कुछ दुर्लभ कॉमिकसे खोज ही निकलता हूँ। 

आप अक्सर स्केच बनाते हैं, स्केचिंग का शौक कब लगा?
सुप्रतिम - स्केचिंग का  शौक  मुझे कॉमिक्स से नही  लगा। उन दिनो (1993) जुरासिक पार्क फिल्म का क्रेज़  सबके सिर चढ़के बोल रहा था , मेरे घर पे एक किताब थी जिसका नाम था "अतीत साक्षी फ़ॉसिल" उस किताब मे डाइनॉसॉर के बारे मे जानकारियाँ थी और अनूठे चित्र थे, मैं दिन भर उन्ही के चित्र कॉपी करने के कोशिश मे लगा रहता था। कुछ एक बार जब मेरे इन प्रयासो को लोगो ने मुर्गी,बतक के चित्र के रूप मे शिनाख्त की तो मैं फिर कॉमिक स्टार्स के चित्र बनाने लगा। बचपन मे सबसे ज़्यादा चित्र मैने भेड़िया के बनाए (प्री-1997) ,नागराज के चित्र बनाते हुए मैं काई बार पढ़ाई के वक़्त पकड़ा भी गया। आज कल समय मिलता नही हैं पर उत्सुकता पहले जैसी ही हैं।

आपके हिसाब से एक अच्छी कॉमिक्स के क्या मापदण्ड हैं? 
 सुप्रतिम - एक अच्छी  कॉमिक्स का मापदंड किसी एक विषय पे निर्भर नहीं करता, पर पहला मापदंड यह हैं की उसके चित्र और कहानी में से कोई भी एक पहलु जोरदार होनि चाहिये। हालाकी चित्र अव्वल दर्जे का हो तो सबसे पहले ध्यान आकर्षित करता है। पर ऐसे कॉमिक भी होते हैं जिनमे चित्र का योगदान कम होता है और कहानी इतनी ज़बरदस्त होती है की दिल को छु जाती हैन.जैसे की "अधूरा प्रेम".वैसे ही काफ़ी ऐसे कॉमिक्स भी होते हैं जिनके साधारण से कहानी को
चित्रकला के वजह से एक अलग ही आकर्षण मिलता हैन. मनु जी के द्वारा बनाए गये सभी परमाणु के कॉमिक्स इस श्रेणी मे आते हैं. आज भी अगर कॉमिक्स के क्वालिटी की बात आए तो आकर्षक चित्रकला ही वो प्रमुख माध्यम हैं जिससे आप एक कॉमिक्स से प्रभावित होते हैं। 

अपनी पसंदीदा कॉमिक्स, लेखक, कलाकार और कॉमिक किरदारों के बारे में बताएं। 
सुप्रतिम - मेरी पसंदीदा कॉमिक्स, किरदार के हिसाब से देखा जायें तो  होंगे ग्रांड मास्टर रोबो, ख़ज़ाना सीरीज़, भूल गया डोगा, टक्कर, खरोंच, 48 घंटे सीरीज़, लाश कहा गयी, चमकमणी, महारावण सीरीज़, अग्नि मानव सीरीज़, प्रोफ शंकु सीरीज़ आदि। अनुपम सिन्हा जी ,सत्यजीत राय,संजय जी मेरे प्रिय लेखक मे से हैं। प्रताप जी,अनुपम जी, मनु जी, डिगवॉल जी, ललित शर्मा जी, चंदू जी, सुजोग ब्न्दोपध्यय जी, अभिषेक चटेर्ज़ी, मलसुनी जी, मयुख चौधरी जी,गौतम कर्मकार
जी मेरे प्रिय कलाकार हैं।  ध्रुव, नागराज, परमाणु, डोगा, भेड़िया, प्रोफेसर शंकु, कौशिक, फेलूदा, महाबली शाका,फॅनटम, घनादा मेरे फ़ेवरेट क़िरदार हैं। 

बचपन की कोई हास्यास्पद घटना, याद बांटिये। 
सुप्रतिम - बचपन मे मेरे एक राजस्थानी मित्र राकेश कुमार मीना ने मुझे पहली बार राज कॉमिक से अवगत कराया। उसीके साथ हुआ एक वाक़या मुझे याद हैं जिसे हास्यास्पद घटना कहा जा सकता हैं। राकेश और मेरे पास जितनी भी कॉमिकस थी, उनको हम एक्सचेंज करके पढ़ते थे। एक बार हुआ यह की मुझे उससे दो कॉमिक से लेनी थी, जिनमे से एक थी इंद्र की और दूसरी थी ताउजी कि, अब हुआ यह की यह दोनो कॉमिक आठ रुपये के थे। जब मैने उसे अपने दो कॉमिकसे दी तो उसने मुझे कहा की तेरे दो कॉमिक्सो का मूल्य पन्द्रह रुपये हैं तो मैं तुझे मेरे दो कॉमिक, जो की सोलह रुपये के हैं, तुझे नही दे सकता। उसके इस बिज़नेस माइंडनेस की जब भी कल्पना करता हू तो आज 22 साल बाद यह घटना हास्यास्पद ही लगता हैं। दूसरी घटना भी 1995 की ही हैं, मैं अपने फॅमिली के साथ जा रहा था बन्गलोर्, हम कलकत्ता  मे ठहरे हुए थे और मशहूर कॉलेज स्ट्रीट से होके गुज़र रहे थे की मुझे एक दुकान मे कॉमिकस दिखि। मेरे कहने पे पापा ने मुझे दो कॉमिकसे दिलवाई, एक थी “बौना शैतान” और दूसरी “ताजमहल की चोरिं “मुझे हैरत हुई जब दुकानदार ने पापा से 6 ही रुपये माँगे, और मुझे पहली बार मालूम पड़ा की सेकेंड हॅंड बुक्स किसे कहते है। बचपन के यह मासूम किससे सही मायने मे हास्यास्पद ना सही,होठों पे मुस्कान ज़रूर लाती हैं। 

बदलते समय के अनुसार कॉमिक्स प्रकाशकों को क्या सलाह देना चाहेंगे?
सुप्रतिम - देसी कॉमिक्स के दौर को मैं कूछ किस्म मे बाँटना चाहूँगा. 1940-1970 के दशक मे बंगाल मे वीदेसी कॉमिक्स के अनुकरण मे काफ़ी विकसित कॉमिकस बनी, जिनमे सायबॉर्ग जैसे कॉन्सेप्ट्स काम मे लाए गये। 1970 से हिन्दी कॉमिक इंडस्ट्री मे भी सहज सरल चित्रो के साथ कॉमिकसे आई। 1980 से कॉमिकसे काफ़ी विकसित हो गई और 1990-2000 तक हिन्दी कॉमिक इंडस्ट्री का सुनेहरा दौर रहा। 2000 के बाद की बात करें तो डिजिटल फॉरमॅट्स के बदौलत हिन्दी कॉमिक इंडस्ट्री मे काफ़ी चेंजस आयें। आज भी कुछ कॉमिक्स मे जैसे की बंगाली कॉमिक्स इंडस्ट्री मे मैनुअल कलरिंग का प्रयोग बखूबी से किया जाता हैं। समय के साथ कुच्छ इंडस्ट्रीस बदल गये और कूछ ने अपना पुराना स्टाइल बरकरार रखा, पर एक अच्छी कॉमिक्स को आज भी फैंस जैसे  भाँप लेते है। बदलते समय में स्टाइल बदला होगा पर अच्छे कॉमिक्स का मापदंड वही हैं जो पहले से थे। प्रकशको से मेरी बीनति रहेगी की यह पॅशन ही हैं जो एक कॉमिक को आकर्षक बनाती हैं ना की नयी तकनीक. कॉमिक बनाते वक़्त उन मौलिकताओ का ध्यान रखे जिनकी वजह से कॉमिक्स ने हमारे बचपन को इतने रंगो मे रंगा। 

कॉमिक्स पाठकों के लिए आपका क्या सन्देश है?
सुप्रतिम - कॉमिक्स पाठक बंधुओ के लिए मैं यही बोलना चाहूँगा की आप मे से काफ़ी लोग अभी किसी कारणवश कॉमिक्स से दूर होते जा रहे हैं, कोशिश  करिए की अपने आनेवाले पीढ़ी को आप प्रोत्साहित करे कॉमिक्स पढ़ने के लिए और खुद भी पढ़ें और खरीदें। 

- मोहित शर्मा ज़हन

Saturday, January 2, 2016

*Featured* - मेरा कामिक संग्रह (Sanjay Singh)

7 साल हो गए है हिंदी कामिक्सो से संबंधित विभिन्न आनलाईन ग्रुप्स, फारम, कम्यूनिटिस, इत्यादि मे एक सक्रिय कामिक फैन के तौर पर विचार-विमर्श, परिचर्चा, इत्यादि करते हुए। हिंदी कामिक्सों से जुडे हुए कई सारे पहलओ पर अपने विचारो का रखा है। फिर चाहे वो राज कामिक्स की कार्यशैली की समीक्षा हो या आजकल चल रही कामिक्सों की कालाबाजारी की निंदा। अगस्त 2008 मे जब मैंने राज कामिक फारम को ज्वाईन किया था तब मेरा मकसद था कामिक्सों से जुडी हुई अपनी यादों को ताजा करना। लेकिन उसी साल अक्टूबर मे कुछ ऐसा हुआ कि कामिक्सों से जुडी हुई यादों को ताजा करने का एक और तरीका मिल गया। ये था पहला “नागराज जन्मोत्स”। और वो तरीका था कामिक्से संग्रह करने का।
2008 नागराज जन्मोत्सव मेरे लिए कई मायनों से यादगार और खास रहा। एक खास वजह तो ये ही थी कि मैं पहली बार अपने प्रिय चित्रकारों और लेखकों से मिल रहा था। लेकिन एक दूसरी वजह भी थी जिसने मेरे कामिक के जुनून को उस दिन कई गुणा बढा दिया। मैं पहली बार ऐसे कामिक फैन्स से मिला जिनमे मेरी ही तरह कामिक के लिए बेइतंहा दीवानापन था। यहां मैं रवि यादव का नाम लेना चाहूँगा जो उस भाग्यवादी दिन मुझे वहां मिला था। कामिक्सों के प्रति लोगो का प्यार देखकर मुझ मे और मेरे दोस्त आकाश मे एक नए जोश का संचार हुआ और इस कार्यक्रम से प्रेरित और उत्साहित हो कर हम दोनो ने अपने कामिक संग्रह को बढाने का निश्चय किया।
इससे पहले मेरे पास मुश्किल से 50 या उससे भी कम कामिक्से थी और वो भी सिर्फ ध्रुव की कामिक्से। इस वक्त मे एक बहुत कम वेतन वाली नौकरी कर रहा था। (जिसे मैंने नवम्बर 2008 मे छोड भी दिया था और उसके बाद 2 साल तक बेरोजगार रहा) और कामिक्से भी गिनी-चुनी लेता था। ध्रुव, नागराज की आंतकहर्ता और नागायाण सीरिज। हालांकि उस वक्त और भी अच्छी सीरिजे आ रही थी दूसरे हीरोज की लेकिन पैसे की कमी के चलते उन्हे प्राथमिकता देने मेरे बस की बात नही थी। तो अब ये तो सोच लिया था कि कामिक्से खरीदनी है लेकिन नई कामिक्सें खरीदना अभी हैसियत से बाहर था। तो ये निश्चय किया कि फिलहाल उन कामिक्सों को खरीदा जाए जिनको बचपन मे पढा था और जिनकी वजह से आज हम कामिक्सों पर इतनी चर्चा करने लायक बने। पुरानी कामिक/किताबों के बारे मे सोचते ही ध्यान आया दरियागंज की संडे बुक मार्केट का। मैं साल 2007 मे एक बार इस बुक मार्केट मे आया था और तब देखा था कि कामिक्से भी मिल रही थी। उस वक्त इनकी कीमत भी बहुत साधारण हुआ करती थी। अकसर आधे दाम पर मिल जाती थी। बिना किसी मोल-भाव के। तो मैंने और आकाश ने ये फैसला किया कि हम हर रविवार को मार्केट जाएंगे कामिक खरीदने। और इसका श्री गणेश भी साल 2008 के अंत से पहले हो भी गया।
शुरु मैं हमारी प्राथमिकता सिर्फ राज कामिक ही थी। क्योंकि उस वक्त कामिक खरीदने की मुख्य वजह उन्हे सिर्फ पढना ही था। यहां मैं एक बात बताना चाहूँगा कि मेरा कामिक संग्रहकर्ता बनने का कोई इरादा नही था। मुझे तो उस वक्त ये मालूम भी नही था कि लोग कामिक्सों का भी संग्रह करते है। मुझे 1-2 साल बाद इस बात का पता चला।
शुरुआत मे कामिक्सों की खरीदारी काफी धीमी रही। उसके एक वजह तो पैसे की कमी थी। मैं अपनी नौकरी छोड चुका था। और आगे भी दो साल तक बेरोजगार रहा। दूसरी वजह ये थी कि उस वक्त हम कामिक्से लेने मे बहुत ही नुख्ता-चीनी करते थे। मतलब कि सिर्फ वही कामिक्से ले रहे थे जिन्हे हम पसंद करते थे। यानि कि सिर्फ अपने प्रिय किरदारों की ही कामिक्से ले रहे थे जिनमे राज कामिक्स मे नागराज, ध्रुव आदि की कामिक्से ही मुख्य तौर पर शामिल थी। उस वक्त मनोज, तुलसी, राधा इत्यादि प्रकाशकों की कामिक्से भी मिलती थी लेकिन हमने उस वक्त उन पर कभी ज्यादा ध्यान नही दिया। कभी मन किया या कोई कामिक अच्छी लगी तभी उसे खरीदा वर्ना उन्हे छोड ही दिया। ये सब साल 2008-2009 के बीच हुआ। उस वक्त कामिक्से हम कम ढूंढ पाते थे लेकिन बाकी चीजो की खरीदारी पर ज्यादा पैसे खर्च कर रहे थे।
दरियागंज मे जब ज्यादा सफलता नही मिली तो मैंने अपने घर के आसपास कामिक्सों को तलाशना शुरु किया। किसी जमाने मे नांगलोई मे कामिक्सों की काफी दुकानें हुआ करती थी। और लगभग हर एक बुक डिपो वाले ने कभी ना कभी तो कामिक्से रखी ही थी अपने पास। लेकिन वक्त और तकनीक के साथ कामिक्से अपनी लय बरकरार नही रख पाई और धीरे-धीरे वहाँ कामिक्से दिखनी बंद हो गई। फिर भी मुझे कुछ दुकानों पर उनके मिलने की उम्मीद अभी भी थी। यही सोचकर एक दुकान पर पहुंचा। और वहां तो जैसे मुझे खजाना ही मिल गया। ज्यादातर राज कामिक थी और उन मे से मुझे मेरे प्रिय सुपर हीरो सुपर कमांडो ध्रुव की भी कुछ ऐसी कामिक्से मिल गई जो मैं ढूंढ रहा था। शाम को फोन करके मैंने आकाश को सारी बात बताई और अगले दिन वो भी मेरे घर आ गया कामिक्से लेने। उसने भी काफी सारी कामिक्से उस दुकान से ली। फिर मैंने कुछ और दुकानों पर भी भाग्य को आजमाया और सफलता भी मिली लेकिन बहुत थोडी सी। अब फिर से दरियागंज की तरफ रूख करना पडा। लेकिन अब वहां हमे अपने मतलब की कामिक्से बहुत कम ही मिल पा रही थी। इसलिए अब कामिक्सों को लेकर कुछ ज्यादा उत्साह नही रह गया था दरियागंज मे। ज्यादातर तफरी ही हो रही थी। सुबह पहुंच जाते वहाँ, और हर तरह की दुकान देखकर दोपहर तक वापिस भी आ जाते। और ऐसा साल 2010 के मध्य तक जारी रहा। लेकिन मैंने और आकाश ने दरियागंज जाना बंद नही किया। चाहे गर्मी हो, बारिश हो या सर्दी हो। या फिर 15 अगस्त, 26 जनवरी जैसे बडे अवसरों पर सुरक्षा के तहत बाजार ही क्यों ना बंद हो। हम जाते जरूर थे। बीच मे हमारा दोस्त रवि भी 1-2 बार हमारा साथ देने आया।
अब साल 2010 शुरु हो गया था और हम अपने नए घर मे चले गए थे। अब दरियागंज और भी दूर हो गया था। अब बाजार मे पहुंचने के लिए साईकल, रेल और पैदल यात्रा तीनों माध्यमों का इस्तेमाल हो रहा था। ये समय मेरे लिए काफी मुश्किल भरा था। क्योंकि इतनी मेहनत करने के बाद भी बाजार पहुंचने पर मुझे कुछ नही मिलता था। ऊपर से अब बेरोजगार हुए डेढ साल से ज्यादा हो गए थे और सेविंग भी खत्म होने लगी थी। इन्ही सब के बीच मे 2010 के शुरु के चार 4-5 महीने निकल गए। पैसे खत्म हो रहे थे, जोश दम तोड रहा था, और उम्मीद ना-उम्मीद मे तबदील हो रही थी।
मई का महीना चल रहा था और ऐसे ही खाली निकला जा रहा था। एक रविवार को मैंने आकाश से कहा कि यदि आज भी कोई कामिक बाजार मे नही मिली तो मैं अगले 3-4 रविवार बाजार नही आऊंगा। उसने भी मेरी बात का समर्थन किया। लेकिन जैसे उस दिन भगवान हमे पिछले डेढ साल की कडी मेहनत का फल देने वाला था। बाजार मे थोडा घूमने पर हमे एक जगह बहुत सारी कामिक्से नजर आई। वो भी मिंट कंडिशन मे। राज कामिक्स की बहुत सारी पुरानी कामिक्से जिसमे ध्रुव, नागराज, डोगा, जनरल, आदि सभी तरह की कामिक्से शामिल थी। हमारी तो खुशी का ठिकाना ही नही रहा। कीमत भी बहुत ही साधारण। मात्र 5-10 रु। उस दिन मेरे पास जितने पैसे थे वो सारे कामिक खरीदने मे ही खर्च हो गए। लेकिन हमे ये मालूम नही था कि ये तो सिर्फ शुरुआत है और अगले 1-2 महीने तक हमे इतनी कामिक्से मिलने वाली है कि हमे पैसो की भारी कमी का सामना करना पडेगा। अगले हफ्ते जब हम फिर बाजार पहुंचे तो फिर से वही दुकानदार ढेर सारी कामिक्से लाया था। इस बार उनमे राज के अलावा मनोज, राधा, तुलसी, गोयल इत्यादि दूसरे प्रकाशकों की कामिक्से भी सब एकदम नयी कंडिशन मे। और सोने पर सुहागा ये कि उन कामिक्सों मे से कुछ के अंदर स्टीकर्स भी थे। मेरे पास जितने भी तुलसी कामिक्से के स्टीकर्स है वो सारे यही से ली गई कामिक्सों से है। अब तो जैसे एक नया जुनून सा सवार हो गया बाजार मे आने का। आने वाले 3-4 हफ्ते तक वो बंदा ढेरों कामिक्से लाता रहा और हम भी अपने बजट और जरूरत के हिसाब से कामिक्से खरीदते रहे। इसी बीच मैंने अपने दोस्त विशाल उर्फ बंटी को भी इस बारे मे बता दिया और वो और हमारा एक और दोस्त राहुल भी 1-2 बार कामिक्से लेने के लिए बाजार आए। बंटी को मैं अपने साथ कुछ और दुकानों पर भी लेकर गया और वहां से भी हमने बहुत सारी कामिक्से खरीदी। इसके साथ ही मेरी और आकाश की मुलाकात कुछ और भी कामिक्स प्रेमियों से हुई। आशीष त्यागी, प्रदीप शेहरावत और शाहिद अंसारी। (उस वक्त शाहिद अंसारी हमारे लिए फैन ही थे) इन लोगो के साथ मिलकर भी खूब सारी कामिक्से खरीदी। शाहिद अंसारी हमे एक दुकान पर भी लेकर गए जिसके पास बहुत सारी कामिक्से थी। वहां से मैंने अपने एक फारम के दोस्त अजय ढिल्ल्न के लिए भी बहुत सारी कामिक्से खरीदी। सब 5-10 रुपये मे। इसी बीच मेरे एक्जाम शुरु हो गए। एक्जाम के दिनों मे ही रवि, आकाश और बंटी उस दुकानदार के घर पर भी गए जो रविवार को बाजार मे कामिक्से लाता था और उसके घर से भी उन्होंने काफी कामिक्से खरीदी। बाद मैं फारम का एक और दोस्त (सुप्रतीम) जब अपनी छुट्टी मे दिल्ली आया तो मैंने और आकाश ने उसको बहुत सारी कामिक्से दिलवाई। कुछ तो रविवार बाजार से ही और काफी सारी उस दुकान से जिस पर शाहिद हमे लेकर गया था। इसके अलावा मैंने एक दुकान और ढूंढ ली थी जिस पर हमे काफी कामिक्से मिली। यहां से कामिक्से खरीदने वालो मे मेरे, आकाश और प्रदीप जी के अलावा शाहिद अंसारी भी थे। इस तरह मई से लेकर जुलाई-अगस्त तक कामिक्सों की काफी खरीदारी हुई। लेकिन अब समस्या ये आ गई कि मेरे पास सेविंग लगभग खत्म हो चुकी थी। नागराज जन्मोत्सव 2010 के बाद स्थिति ये आ गई थी कि अब नौकरी करना जरुरी हो गया था। अब दो साल होने वाले थे बिना किसी रोजगार के। नवम्बर 2010 मे एक नौकरी मिल गई और पैसों की चिंता कुछ हद तक खत्म हुई।
साल 2011 की शुरुआत पिछले साल से भी बेहतर रही। इस साल मार्च मे एक दुकानदार के काफी सारी कामिक्से आई थी। लेकिन उनमे से ज्यादातर शाहिद अंसारी ने ही ले ली थी। मुझे थोडी बहुत ही अपनी पसंद की कामिक्से मिली। लेकिन उस दुकानदार ने मुझे बताया कि उसके पास घर पर अभी और भी कामिक्से रखी हुई है। मैंने उसका पता और फोन नम्बर ले लिया और शनिवार को उसके घर गाजियाबाद जा पहुंचा। वहां से मैंने अपनी जिंदगी की अब तक की सबसे ज्यादा कामिक्से एक साथ खरीदी। और वो भी आधे दामों मे। उसके पास ज्यादातर राज कामिक्से ही थी। लेकिन उससे मुझे महारावण सीरिज की काफी सारी कामिक्से एक साथ मिल गई। और इसके साथ ही मुझे कनकपुरी की राजकुमारी भी मिली। साथ ही और भी बहुत सारी नई-पुरानी कामिक्से मिली। वो दिन एक यादगार दिन रहा मेरी जिंदगी का। पहली बार दिल्ली से बाहर जाकर कामिक्से खरीदना वाकई मेरे लिए एक बेहद खास अनुभव रहा। फिर आगे भी उस दुकानदार से बाजार मे ही कामिक्से लेते रहे जब तक कि उसके पास कामिक्से खत्म ना हो गई हो। इसके बाद शायद अगस्त-सितम्बर के बाद एक बार फिर से बहुत सारी कामिक्से बाजार आई। शुरु मे तो वो कामिक्सें हमे जायद दामों (5-10 रुपए) मे मिल गई। लेकिन जब अगले सप्ताह हम उन्ही दुकानदारों पर दुबारा पहुंचे तो सबने कीमत बढा कर बताई कुछ तो प्रिंट पर ही दे रहे थे। हमारे लिए ये पहला ऐसा मौका था जब हम कामिक्से महंगे दामों पर मिल रही थी। हम पुरानी कामिक्से हमेशा 5-10 रुपए मे ही लेते आए थे। अत:एव हमने वो कामिक्से नही खरीदी और उन्हे छोड दिया। बाद मे कामिक्सों के विक्रेताओं ने वो कामिक्से खरीदी। इसके बाद 2011 मे कुछ खास नही हुआ।
2012 मे तो याद भी नही कि कुछ खास हुआ था या नही। सिर्फ कामिक कान याद है। इसके अलावा महफूज भाई से मुलाकात हुई और उन्हे कोबी और भेडिया कामिक दी। साथ ही ध्रुव के कुछ विशेषांक भी महफूज को दिए थे। बदले मे महफूज ने भी मुझे कामिक्से दी। अब संडे मार्किट जाने का भी मन नही करता था। आकाश ने अब मार्किट आना बहुत कम कर दिया था। और मैं ही अकेला आता था। ऐसे ही एक बार 15-20 रुपए मे इंद्रजाल कामिक्से मिल गई थी। तकरीबन 25-35 कामिक्से थी और ज्यादातर अंग्रेजी मे ही थी। एक बार 40 के करीब टिंकल भी मिली थी। पुरानी टिंकल हिंदी और अंग्रेजी मे। 5 रुपए प्रति कामिक। कामिक्से अब कम मिल रही थी लेकिन उनकी कीमते फिर भी काफी नियंत्रण मे थी।
साल 2013 के शुरुआत मे ही मैंने ये मन बना लिया था कि अब ये आखिरी साल है कामिक्से कलैक्ट करने का। शुरुआत ठीक-ठाक रही। अप्रैल मे महफूज भाई का निमंत्रण मिला कि उनके शहर सहारनपुर मे काफी कामिक्से है मेरे लायक। वहां जाकर तकरीबन 1000 रु की कामिक्से खरीदी। सब प्रिंट रेट पर ली। बहुत ही बेहतरीन अनुभव रहा दूसरे शहर मे जाकर कामिक्से खरीदने का। बाद मे इसी महीने सागर राणा जी से भी मुलाकात हुई। वो दिल्ली आए हुए थे। उन्होंने मुझे जम्बू की पहली कामिक सुपर कम्पयूटर का बाप दी। महफूज भी उसी दिन दिल्ली आया और उसने भी उनसे मुलाकात करी। मैंने महफूज को कोहराम कामिक दी और बदले मे उसने मुझे बुद्धिपासा दी। वो दिन भी बहुत खास रहा। आकाश भी उस दिन सागर राणा जी से मिलने बाजार आ गया था। अप्रैल के बाद जुलाई मे मुझे गाजियाबाद वाले बंदे से बहुत सारी तुलसी कामिक्से मिली। सब आधे दाम मे। 250 रुपए मे 59 कामिक्से। जुलाई मे ही मेरी मुलाकात फारम मैम्बर स्पार्की रवि से हुई। उसी दिन मैं अयाज अहमद से भी मिला। फिर उसके अगले ही महीने मे मुझे बहुत सारी मनोज कामिक्से मिली। ज्यादातर विशेषांक ही थे। राम-रहीम, हवलदार बहादुर, क्रुकबांड, कांगा और दूसरे मनोज कामिक्स के किरदारों की तकरीबन 90 के करीब कामिक्से मैंने खरीदी। लेकिन ये खरीदारी अब तक की सबसे महंगी खरीदारी साबित हुई। क्योंकि मैंने हर कामिक के दुगने दाम दिए। यानि कि इस बार और पहली बार मैंने प्रिंट रेट से भी ज्यादा कीमत अदा करी। 10-20 रूपए। और जब मैंने ये फेसबुक पर पोस्ट किया तो एक दोस्त (मोहित शर्मा) को बहुत हैरानी हुई कि पुरानी कामिक्से इतनी महंगी कैसे हो गई? खैर वो कामिक्से खरीदकर मैं आकाश के पास गया और उसने उन मे कुछ कामिक्से ले ली। उस दुकानदार के पास अभी और भी बहुत कामिक्से बच गई थी। तो अगले सप्ताह मैं, आकाश और मोहनीश फिर वहां पहुंचे और आकाश और मोहनीश को अपनी पसंद की कामिक्से मिल गई। मोहनीश उस दिन बहुत खुश था क्योंकि उसकी महारावण सीरिज पूरी हो गई थी। इसके अगले रविवार भी हमने वहां से कुछ कामिक्से और खरीदी।
इसके बाद संडे मार्किट से कुछ नही मिला। फिर नवम्बर-दिसम्बर मे राज कामिक्से ने कामिक फेस्ट इंडिया का आयोजन किया। इस इवेंट मे राज कामिक्स ने पुरानी कामिक्सों का स्टाल लगा रहा था जहां पर 30 रुपए प्रति कामिक की दर से कामिक बेची जा रही थी। मैं ज्यादा कामिक्से नही खरीद सका और जो खरीदी भी उन मे से ज्यादातर उसी दाम पर बाद मे बेच भी दी। कामिक फेस्ट के बाद ही दोस्त की शादी मे नागपुर जाना पडा और वहां से भी थोडी बहुत कामिक्से खरीदी। अब साल का आखिरी महीना चल रहा था और आखिरी महीने के आखिरी रविवार मैं पूरा दिन वही मार्किट मे ही घूमता रहा। जैसे उस जगह से जुडी हुई सारी पुरानी यादों को इकट्ठा कर रहा था।
साल 2014 मे मैं दरियागंज काफी कम गया। अगर गया भी तो कामिक्स खरीदने के इरादे से नही और ज्यादातर शाम के वक्त ही गया। साल 2008 से 2013 तक मैंने काफी कामिक्से खरीदी और अब तो ऐसा लगता है कि हमने काफी अच्छे समय मे कामिक्सों का सग्रंह बनाया। आज के दौर मे तो मेरे लिए ये बिल्कुल ही नामुमकिन होता। फिलहाल मेरे संग्रह मे 2400 से ज्यादा कामिक्से है। हिंदी, अंग्रेजी, नई, पुरानी, ओरिजिनल, रिप्रिंट्स सब तरह की मिलाकर। सबसे ज्यादा कामिक्से राज कामिक्स की ही है। इसके अलावा स्टीकर्स, ट्रेडिंग कार्डस, पोस्टर और दूसरे तरह की कामिक्सों से जुडी हुई चीजो का भी अच्छा खासा क्लैक्शन है। काफी खुशी होती है अपना कामिक संग्रह देखकर। उसकी दो खास वजह है। पहली तो ये कि मैंने अपना कामिक क्लैक्शन बहुत ही मेहनत, ईमानदारी और किफायती कीमत पर बनाया है। इसमे जिन दोस्तो ने मदद करी उनका नाम मैं इस लेख मे लिख चुका हूँ। कोई रह गया है तो उसके लिए माफी चाहूँगा। कामिक संग्रह करते समय कभी भी कालाबाजारी को बढावा नही दिया। कभी ऊंचे दाम पर कामिक्से नही खरीदी। दूसरी वजह यह है कि मैं बचपन से ये चाहता था कि मेरे आस-पास ढेर सारी कामिक्से हो। अब जब अपनी अलमारी या अपन दिवान खोलकर देखता हूं तो पाता हूं कि जितना मैंने बचपन मैं सोचा था अब उससे कही गुना ज्यादा कामिक्से मेरे पास है। ये एक सपने को जीने के जैसा ही है।
मेरे कामिक संग्रह की एक और विशेषता ये भी है कि मेरे पास सबसे ज्यादा कामिक्से राज कामिक्स ही है लेकिन मेरे पास उनके किसी भी बडे किरदार की सारी कामिक्से नही है। यहां तक कि मेरे प्रिय पात्र सुपर कमांडो ध्रुव की भी मेरे पास सारी कामिक्से नही है। जबकि मनोज के 3-4 किरदारों की सारी कामिक्से मेरे पास है। 
wink emoticon
2008 से शुरु हुई मेरी कामिक की इस जुनूनी यात्रा के दौरान मुझे भारतीय कामिक जगत और कामिक क्लचर के बारे मे बहुत सी बाते जानने को मिली। बहुत से चित्रकारों और लेखकों से भेट हुई। काफी सारे कार्यक्रमों का हिस्सा बना। खासतौर से नागराज जन्मोत्सव और बुक फेयर। जहां तक मुझे याद है 2009 के बाद से ये पहला अवसर था जब इस साल मे अगस्त-सितम्बर बुक फेयर नही गया। काफी दोस्त बने और सब के साथ बहुत ही अदभुत अनुभव सांझा किए।
तो ये थी मेरे कामिक संग्रह की कहानी। कैसे शुरु हुआ, कहां से शुरुआत हुई, कैसे प्रगतिशील हुआ और कैसे अंत हुआ। कामिक क्लैक्ट करने का सफर तो साल 2013 मे खत्म हो गया। लेकिन कामिक पढने का शौक अभी भी जारी है। अब कामिक्सों पर ज्यादा चर्चा नही कर पाता लेकिन राज कामिक्स के नए सैट और नए प्रकाशकों की कामिक्से खरीदना और पढना अभी भी जारी है। और उम्मीद करता हूं कि जैसे पिछले 21 सालों से कामिक्से पढता आया हूँ वैसे ही आगे भी पढता रहूंगा।
जुनून।

Friday, September 18, 2015

Call for Entries - ICF # 09

इंडियन कॉमिक्स फैंडम पत्रिका के आगामी वॉल्यूम # 09 के लिए कॉमिक्स - ग्राफ़िक नोवेल्स संग्राहक मित्रों द्वारा निम्नलिखित विषयों में से किसी एक पर लेख, संस्मरण आमंत्रित है।
*) - मेरे कॉमिक्स संग्रह की कहानी।
*) - एक संग्रहकर्ता के रूप में मेरे लिए सबसे अच्छा वर्ष। 
*) - भारतीय कॉमिक्स के "गोल्डन ऐज" दौर की यादें। 
*) - आपकी कल्पना से कैसा होगा भारतीय कॉमिक्स और उनके कलेक्टर्स का भविष्य?

अगर आप चाहें तो एक से अधिक विषयों का समावेश कर एक लेख बना सकते है। पत्रिका में प्रकाशन हेतु लेखों के चयन का अधिकार प्रकाशक का है। अपने लेख आप letsmohit@gmail.com पर ई-मेल करें या इंडियन कॉमिक्स फैंडम पेज पर मैसेज करें। धन्यवाद!