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Monday, August 26, 2024

ICA Unveils Logo for Inaugural Comics Creator Championship

 

The Indian Comics Association (ICA) has unveiled the official logo for the upcoming Comics Creator Championship. Set to debut at WAVES, this inaugural edition promises an exciting and unprecedented comics creation contest. Stay tuned for this groundbreaking event!

Contest Details

Official Website (ICA) - https://www.indiancomicsassociation.com/

Thursday, December 30, 2021

New Publisher: Swayambhu Comics


Swayambhu Comics #update Up to 15% off till 9th Jan. www.swayambhucomics.in #indiancomics #art #comics 


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Company's first kid's comic book named "Little Battles Big Learning" will go on sale from 1st January 2022.

Tuesday, September 4, 2018

Comics Theory Event (2 September 2018)

Manish Mishra with Abhiraj Thakur

Book launch and art workshop event organized by Comics Theory, Garhwal Bhawan, New Delhi.

Comics Theory Issue #01, Bechara Motelal (UFC), Goodies

Artist Vivek Kaushik Workshop


Vyoma Mishra and Sanjay Singh
Cosplayer Nikhil Verma

Special Guests - Priyadarshan, Arvind Sahu, Smita, Husain Zamin, Vyoma Mishra and Kishor Srivastava

 Artist M.K. Goyal Workshop

Prakash Bhalavi with Pradeep Sehrawat, Shambhu Nath Mahto and M.K. Goyal

Monday, December 11, 2017

Nagraj Cosplay


Nagraj (Raj Comics) Cosplay - Rudra Rajpoot, Event - Nagraj Janmotsav, 07 December 2017. #comics #cosplay #indiancomics #nagraj #rajcomics

Tuesday, December 5, 2017

Cosplay scene in India


टेलीविजन, किताब, कॉमिक, एनिमेशन, वीडियो गेम जैसे माध्यमों के किसी चर्चित किरदार जैसा श्रृंगार और वेशभूषा अपनाने को कॉस्प्ले कहा जाता है। पिछले 4-5 वर्षों में भारतीय कॉस्प्ले कम्युनिटी काफी बड़ी हो गयी है। बड़े शहरों में कॉस्प्ले क्लब हैं, कुछ कॉसप्लेयर्स के प्रशंसकों की संख्या दस हज़ार पार कर चुकी है और तेज़ी से बढ़ती जा रही है। अब कॉमिक कॉन ही नहीं महानगरों में होने वाले कई आयोजनों में कॉस्प्ले कार्यक्रम, प्रतियोगिताएं शामिल की जाती हैं। कॉमिक कॉन में आने वाले कॉसप्लेयर्स की संख्या तो इतनी अधिक है कि फिल्म, कॉमिक्स, वीडियो गेम आदि श्रेणी के अनुसार अलग-अलग विजेता घोषित किये जाते हैं, वो भी कॉन के 3 दिनों में हर दिन अलग प्रतियोगिता। भारत में आयोजित कॉस्प्ले प्रतियोगिताओं को जीत कर समीर बुंदेला यू.एस.ए. और आकांक्षा सचान जापान में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। भारतीय कॉमिक किरदारों पर कॉस्प्ले की जो कुछ कोशिशें हुई वो तारीफ़ लायक थीं पर उनको निरंतर कॉसप्ले करने वाले प्रशंसकों ने नहीं किया था; इसलिए उन अच्छे प्रयासों में पूर्णता, गहन डिटेलिंग नहीं लगी। आगे हो सकता है विविधता खोजता कोई नामी कॉसप्लेयर किसी भारतीय सुपरहीरो का कॉसप्ले करे पर क्या उस से पहले इतनी बड़ी कम्युनिटी से एक प्रशंसक ऐसा कॉसप्ले नहीं कर सकता जिसे देख कर यह ना बोलना पड़े कि "चलो किसी ने इन किरदारों पर ट्राई तो किया, वैरी गुड!" बल्कि अपने-आप मुँह से निकले "अरी मईया री...देखो मुझे मौत आ गयी ये कॉस्प्ले देखकर!" है कोई इस चैलेंज को एक्सेप्ट करने वाला/वाली? :)
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Pic - Cosplayer IMJM

Sunday, July 2, 2017

TBS Planet Completes 1 Year


Rajeev Tamhankar (Founder, TBS Planet Comics) - "This has been a very special moment for us! TBS Planet Comics just turned 1. And we celebrated the occasion with our employees, their parents and the Mayor of Jabalpur. The event was followed by cake-cutting, dinner and our Quarterly and Annual employee awards."



Superhero of the Quarter Award (January-March) 2017 - Pawan Kulkarni
Superhero of the Quarter Award (April-June) 2017 - Salil Kolhe
Superhero of the Year 2016-17 Award - Pallavi Kulkarni

Thursday, April 13, 2017

Interview with Superfan Supratim Saha

नागपुर में रह रहे सुप्रतिम साहा का नाम भारतीय कॉमिक्स प्रेमियों के लिए नया नहीं है। सुप्रतिम भारत के बड़े कॉमिक्स कलेक्टर्स में से एक हैं, जो अपने शौक के लिए जगह-जगह घूम चुके हैं। कहना अतिश्योक्ति नहीं, ऐसे सूपरफैंस की वजह से ही भारतीय कॉमिक्स उद्योग अभी तक चल रहा है। पहले कुछ कॉमिक कम्युनिटीज़ में इनका अभूतपूर्व योगदान रहा और समय के साथ ये अपने काम में व्यस्त हो गए। हालांकि, अब भी कुछ कॉमिक्स ग्रुप पर सुप्रतिम दिख जाते हैं। ये मृदुभाषी और सादा जीवन व्यतीत करने में विश्वास करते हैं, इनके बात करने और वाक्य गढ़ने का तरीका मुझे बहुत भाता है इसलिए साक्षात्कार के जवाब में मेल से भेजे इनके जवाबों को जस का तस रखा है। 

अपने बारे में कुछ बताएं?
सुप्रतिम - 80 के दशक में भारत के पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा में मेरा जनम हुआ। मैने अपनी स्कूलिंग अगरतला शहर से की। मैने इंजिनियरिंग की नागपुर शहर से और बॅंगलुर शहर मे कुछ टाइम जॉब करने के बाद मैने मास्टर्स की चेन्नई शहर मे, आज मैं नागपुर के एक कॉलेज मे वाइस प्रिन्सिपल के पद पे काम कर रहा हू. आज भी मैं रेगुलार कॉमिकस खरीदता हू और पढ़ता हु्। मुझे मालूम हैं मेरा यह जुड़ाव कॉमिक्स के साथ हमेशा  रहेगा. इस सफ़र मे मैं अपने कुछ दोस्तो का नाम लेना चाहूँगा जिन्होने हमेशा मेरा साथ निभाया, बंटी फ्रॉम कोलकाता, संजय आकाश  दिल्ली से, गुरप्रीत पटियाला से, और बहत सारे दोस्त, वरुण ,मोहित, महफूज़ ,ज़हीर,विनय,अजय ढिल्लों  जिन्हे मैं ऑनलाइन मिला और इन सब से भी मेरी काफ़ी अच्छी दोस्ती हैं। सबके नाम शायद मैं यहा लिख नही पाया पर  मैं सबका आभारी हूँ जिन्होने इस सफ़र पे मेरा साथ निभाया। 

कॉमिक्स कलेक्शन का आपका सफर कैसे शुरू हुआ?
सुप्रतिम - मेरे कॉमिक्स पढ़ने की अगर बात करे तो ये शुरुवात हुई थी 1991-92 के आसपास। उन दिनों मैं क्वार्टर में रहता था और हर एक  घर से बटोर के जो कॉमिक्स मुझे मिलते थे उनमे से ज़्यादा तर या तो टिनटिन होते थे या फिर इंद्रजाल कॉमिक्स।  हिंदी कॉमिक इंडस्ट्री से मैं जुड़ा 1994 में जब मेरे एक राजस्थानी मित्र ने मुझे दो कॉमिक्स दी, वो दो कॉमिक्स थे डॉ नो और उड़ती मौत। राज कॉमिक्स और साथ ही अन्य हिंदी  कॉमिक्स के साथ मैं इन्ही दो कॉमिक्स की वजह से जुड़ा। 

अब तक कॉमिक्स के लिए कहाँ-कहाँ घूम चुके हैं?
सुप्रतिम - कॉमिक्स के लिए ट्रेवल करना मैंने शुरू किया सन 2009 से, यह वो समय था जब मैं बैंगलोर में था.बैंगलोर के अनिल बुक शॉप से बहत सारी कॉमिक्स मैंने रिकलेक्ट की.इसको छोड़के मैंने सबसे ज़्यादा कॉमिक्स कलेक्ट की नागपुर से। इस शहर ने मुझे ऑलमोस्ट 1500 + कॉमिक्स दी जिनमे मैक्सिमम दुर्लभ कॉमिक्स थे। इन 8 सालो में मैंने दिल्ली, नागपुर, कोलकाता, हैदराबाद, बैंगलोर, चेन्नई, पटियाला, अम्बाला, अगरतला जैसे शहरो से भी कॉमिक्स ली। दिल्ली शहर में दरीबा कलां के गोडाउन  से भी मैंने 1000+ कॉमिक्स ली।  इन दो शहर को छोड़के हैदराबाद शहर में भी मुझे 300+ विंटेज डायमंड कॉमिक्स मिलें। ऐसी कॉमिक्स जो की 35 साल से भी अधिक पुराने हैं,जैसे की लंबू मोटू ,फौलादी सिंह ,महाबली शाका ,मामा भांजा और वॉर सीरीज वाली कॉमिक्स। इन सब को छोड़के मेरे पास बंगाली कॉमिक्स भी है भारी संख्या में, करीबन 500 ,जिनमे पिछले 60-80 साल पुराने कॉमिक्स भी हैं। मैं आज भीं रेगुलर कॉमिक्स लेता हु हिंदी बंगाली इंग्लिश में। 

पहले के माहौल और अब में क्या अंतर दिखते हैं आपको?
सुप्रतिम - पहले के माहौल में कॉमिक्स एक कल्चर हुआ करता  था, आजकल कॉमिक्स तो दूर की बात हैं किताबों को पढ़ने के लिए भी पेरेंट्स बच्चो को प्रोत्साहित नहीं करते।  विडियो गेम्स केबल टीवी आदि तो मेरे बचपन में भी आराम से उपलब्ध थे ,पर इन सबके बावजूद अगर हर दिन खेलने नहीं गए, तैराकी नहीं की तो घर पे डांट पड़ती थी। आजकल कॉमिक्स,खासकर के कोई भी "रीजनल " फ्लेवर की कॉमिकस को पढ़ना लोगो के सामने खुदको हास्यास्पद करने जैसा हैं। यही वजह हैं की सिर्फ वही लोग देसी कामिक्से पढ़ते हैं जिनमे रियल पैशन हैं, वरना मंगा और वेस्टर्न कॉमिक्स को ही सीरियस कॉमिक्स समझने और ज़ाहिर करने वालो की भी कमी नहीं हैं। एक कॉमिक बुक फैन होने के नाते मुझे सभी कामिक्से देसी  या विदेसी  अच्छे  लगते  है पर भाषा के नाम पे यह भेदभाव आज बहत ज़्यादा प्रभावशाली हैं। 

अपने शहर के बारे में बताएं।
सुप्रतिम - मेरा जन्म भारत के पूर्वोत्तर मे स्थित अगरतला शहर मे हुआ। गौहाटी के बाद ये पूर्वोत्तर के सात राज्यो मे दूसरा प्रमुख शहर भी हैं। बॉर्डर से सटे होने की वजह से यहा बीएसएफ भी कार्यरत हैं जिनमे से काफ़ी लोग हिन्दी भाषी है। साथ ही साथ ओ एन जी सी होने के कारण से हिन्दी भाषी लोग काफ़ी मात्रा मे मौजूद भी है। ज़ाहिर सी बात हैं की इस वजह से हिन्दी कॉमिक्स शुरू से ही यहा रहते लोगो का मनोरंजन करती आ रही हैं. समय के साथ साथ हिन्दी कॉमिक्स का क्रेज़ यहा काफ़ी कम हो चुका हैं पर आज भी मैं घर जाता हू तो भूले भटके एक आधा दुकान मे कुछ दुर्लभ कॉमिकसे खोज ही निकलता हूँ। 

आप अक्सर स्केच बनाते हैं, स्केचिंग का शौक कब लगा?
सुप्रतिम - स्केचिंग का  शौक  मुझे कॉमिक्स से नही  लगा। उन दिनो (1993) जुरासिक पार्क फिल्म का क्रेज़  सबके सिर चढ़के बोल रहा था , मेरे घर पे एक किताब थी जिसका नाम था "अतीत साक्षी फ़ॉसिल" उस किताब मे डाइनॉसॉर के बारे मे जानकारियाँ थी और अनूठे चित्र थे, मैं दिन भर उन्ही के चित्र कॉपी करने के कोशिश मे लगा रहता था। कुछ एक बार जब मेरे इन प्रयासो को लोगो ने मुर्गी,बतक के चित्र के रूप मे शिनाख्त की तो मैं फिर कॉमिक स्टार्स के चित्र बनाने लगा। बचपन मे सबसे ज़्यादा चित्र मैने भेड़िया के बनाए (प्री-1997) ,नागराज के चित्र बनाते हुए मैं काई बार पढ़ाई के वक़्त पकड़ा भी गया। आज कल समय मिलता नही हैं पर उत्सुकता पहले जैसी ही हैं।

आपके हिसाब से एक अच्छी कॉमिक्स के क्या मापदण्ड हैं? 
 सुप्रतिम - एक अच्छी  कॉमिक्स का मापदंड किसी एक विषय पे निर्भर नहीं करता, पर पहला मापदंड यह हैं की उसके चित्र और कहानी में से कोई भी एक पहलु जोरदार होनि चाहिये। हालाकी चित्र अव्वल दर्जे का हो तो सबसे पहले ध्यान आकर्षित करता है। पर ऐसे कॉमिक भी होते हैं जिनमे चित्र का योगदान कम होता है और कहानी इतनी ज़बरदस्त होती है की दिल को छु जाती हैन.जैसे की "अधूरा प्रेम".वैसे ही काफ़ी ऐसे कॉमिक्स भी होते हैं जिनके साधारण से कहानी को
चित्रकला के वजह से एक अलग ही आकर्षण मिलता हैन. मनु जी के द्वारा बनाए गये सभी परमाणु के कॉमिक्स इस श्रेणी मे आते हैं. आज भी अगर कॉमिक्स के क्वालिटी की बात आए तो आकर्षक चित्रकला ही वो प्रमुख माध्यम हैं जिससे आप एक कॉमिक्स से प्रभावित होते हैं। 

अपनी पसंदीदा कॉमिक्स, लेखक, कलाकार और कॉमिक किरदारों के बारे में बताएं। 
सुप्रतिम - मेरी पसंदीदा कॉमिक्स, किरदार के हिसाब से देखा जायें तो  होंगे ग्रांड मास्टर रोबो, ख़ज़ाना सीरीज़, भूल गया डोगा, टक्कर, खरोंच, 48 घंटे सीरीज़, लाश कहा गयी, चमकमणी, महारावण सीरीज़, अग्नि मानव सीरीज़, प्रोफ शंकु सीरीज़ आदि। अनुपम सिन्हा जी ,सत्यजीत राय,संजय जी मेरे प्रिय लेखक मे से हैं। प्रताप जी,अनुपम जी, मनु जी, डिगवॉल जी, ललित शर्मा जी, चंदू जी, सुजोग ब्न्दोपध्यय जी, अभिषेक चटेर्ज़ी, मलसुनी जी, मयुख चौधरी जी,गौतम कर्मकार
जी मेरे प्रिय कलाकार हैं।  ध्रुव, नागराज, परमाणु, डोगा, भेड़िया, प्रोफेसर शंकु, कौशिक, फेलूदा, महाबली शाका,फॅनटम, घनादा मेरे फ़ेवरेट क़िरदार हैं। 

बचपन की कोई हास्यास्पद घटना, याद बांटिये। 
सुप्रतिम - बचपन मे मेरे एक राजस्थानी मित्र राकेश कुमार मीना ने मुझे पहली बार राज कॉमिक से अवगत कराया। उसीके साथ हुआ एक वाक़या मुझे याद हैं जिसे हास्यास्पद घटना कहा जा सकता हैं। राकेश और मेरे पास जितनी भी कॉमिकस थी, उनको हम एक्सचेंज करके पढ़ते थे। एक बार हुआ यह की मुझे उससे दो कॉमिक से लेनी थी, जिनमे से एक थी इंद्र की और दूसरी थी ताउजी कि, अब हुआ यह की यह दोनो कॉमिक आठ रुपये के थे। जब मैने उसे अपने दो कॉमिकसे दी तो उसने मुझे कहा की तेरे दो कॉमिक्सो का मूल्य पन्द्रह रुपये हैं तो मैं तुझे मेरे दो कॉमिक, जो की सोलह रुपये के हैं, तुझे नही दे सकता। उसके इस बिज़नेस माइंडनेस की जब भी कल्पना करता हू तो आज 22 साल बाद यह घटना हास्यास्पद ही लगता हैं। दूसरी घटना भी 1995 की ही हैं, मैं अपने फॅमिली के साथ जा रहा था बन्गलोर्, हम कलकत्ता  मे ठहरे हुए थे और मशहूर कॉलेज स्ट्रीट से होके गुज़र रहे थे की मुझे एक दुकान मे कॉमिकस दिखि। मेरे कहने पे पापा ने मुझे दो कॉमिकसे दिलवाई, एक थी “बौना शैतान” और दूसरी “ताजमहल की चोरिं “मुझे हैरत हुई जब दुकानदार ने पापा से 6 ही रुपये माँगे, और मुझे पहली बार मालूम पड़ा की सेकेंड हॅंड बुक्स किसे कहते है। बचपन के यह मासूम किससे सही मायने मे हास्यास्पद ना सही,होठों पे मुस्कान ज़रूर लाती हैं। 

बदलते समय के अनुसार कॉमिक्स प्रकाशकों को क्या सलाह देना चाहेंगे?
सुप्रतिम - देसी कॉमिक्स के दौर को मैं कूछ किस्म मे बाँटना चाहूँगा. 1940-1970 के दशक मे बंगाल मे वीदेसी कॉमिक्स के अनुकरण मे काफ़ी विकसित कॉमिकस बनी, जिनमे सायबॉर्ग जैसे कॉन्सेप्ट्स काम मे लाए गये। 1970 से हिन्दी कॉमिक इंडस्ट्री मे भी सहज सरल चित्रो के साथ कॉमिकसे आई। 1980 से कॉमिकसे काफ़ी विकसित हो गई और 1990-2000 तक हिन्दी कॉमिक इंडस्ट्री का सुनेहरा दौर रहा। 2000 के बाद की बात करें तो डिजिटल फॉरमॅट्स के बदौलत हिन्दी कॉमिक इंडस्ट्री मे काफ़ी चेंजस आयें। आज भी कुछ कॉमिक्स मे जैसे की बंगाली कॉमिक्स इंडस्ट्री मे मैनुअल कलरिंग का प्रयोग बखूबी से किया जाता हैं। समय के साथ कुच्छ इंडस्ट्रीस बदल गये और कूछ ने अपना पुराना स्टाइल बरकरार रखा, पर एक अच्छी कॉमिक्स को आज भी फैंस जैसे  भाँप लेते है। बदलते समय में स्टाइल बदला होगा पर अच्छे कॉमिक्स का मापदंड वही हैं जो पहले से थे। प्रकशको से मेरी बीनति रहेगी की यह पॅशन ही हैं जो एक कॉमिक को आकर्षक बनाती हैं ना की नयी तकनीक. कॉमिक बनाते वक़्त उन मौलिकताओ का ध्यान रखे जिनकी वजह से कॉमिक्स ने हमारे बचपन को इतने रंगो मे रंगा। 

कॉमिक्स पाठकों के लिए आपका क्या सन्देश है?
सुप्रतिम - कॉमिक्स पाठक बंधुओ के लिए मैं यही बोलना चाहूँगा की आप मे से काफ़ी लोग अभी किसी कारणवश कॉमिक्स से दूर होते जा रहे हैं, कोशिश  करिए की अपने आनेवाले पीढ़ी को आप प्रोत्साहित करे कॉमिक्स पढ़ने के लिए और खुद भी पढ़ें और खरीदें। 

- मोहित शर्मा ज़हन

Thursday, March 2, 2017

ICF Magazine Volume #11

इंडियन कॉमिक्स फैंडम #11 

Download/Online Read-  ReadwhereISSUUScribdCalameoPDFSRArchives, SSAuthor StreamFliiby, PublitasFreelease, Pothi, Google Books, Google Play, 4Shared and allied websites/apps.

News, photos and Updates: Diamond Comics, Tinkle, Campfire Graphic Novels, Tamil Comics, Champak, Lot Pot, Jasoos Babloo, Red Streak Publications, Raj Comics, Amar Chitra Katha, Holy Cow Entertainment, Meta Desi Comics, TBS Planet Comics, Yali Dreams Creations, Anik Planet, Kavya Comics, Premeir Artfx Studio, Green Humor, MB Comics Studio.
Special: Artist-Author Akshay Dhar Interview, Late Writer Ved Prakash Sharma (Tribute), Artist Gaman Palem, ICF Awards 2016 Champions Corner
Contributors: Vipul Dixit, Vyom Dayal, Aakash Kumar, Mohit, Avyact, Youdhveer Singh, Rishabh Kurmi, Sanjay Singh
Editor: Mohit Trendster
Freelance Talents (March 2017)

भारतीय कॉमिक्स जगत से जुडी ख़बरें, जानकारी, चित्र, लेख, फैन फिक्शन, साक्षात्कार आदि!

Saturday, August 13, 2016

#Update Indian Comics Fandom Awards 2016 #ICFA_2016

Nominations are now being accepted for the Indian Comics Fandom Awards 2016 in order to recognize the efforts, achievements of Indian Comic fans and creatives.

*) – Best Blogger 
*) – Best Cartoonist 
*) – Best Colorist 

*) – Best Reviewer 

*) – Best Comics Collector
*) – Best Fanfiction Writer 
*) – Best Fan Artist
*) - Best Fan Work (Comic, Video, Music etc)
*) - Best Webcomic
*) - Best Cosplayer

Saturday, January 2, 2016

*Featured* - मेरा कामिक संग्रह (Sanjay Singh)

7 साल हो गए है हिंदी कामिक्सो से संबंधित विभिन्न आनलाईन ग्रुप्स, फारम, कम्यूनिटिस, इत्यादि मे एक सक्रिय कामिक फैन के तौर पर विचार-विमर्श, परिचर्चा, इत्यादि करते हुए। हिंदी कामिक्सों से जुडे हुए कई सारे पहलओ पर अपने विचारो का रखा है। फिर चाहे वो राज कामिक्स की कार्यशैली की समीक्षा हो या आजकल चल रही कामिक्सों की कालाबाजारी की निंदा। अगस्त 2008 मे जब मैंने राज कामिक फारम को ज्वाईन किया था तब मेरा मकसद था कामिक्सों से जुडी हुई अपनी यादों को ताजा करना। लेकिन उसी साल अक्टूबर मे कुछ ऐसा हुआ कि कामिक्सों से जुडी हुई यादों को ताजा करने का एक और तरीका मिल गया। ये था पहला “नागराज जन्मोत्स”। और वो तरीका था कामिक्से संग्रह करने का।
2008 नागराज जन्मोत्सव मेरे लिए कई मायनों से यादगार और खास रहा। एक खास वजह तो ये ही थी कि मैं पहली बार अपने प्रिय चित्रकारों और लेखकों से मिल रहा था। लेकिन एक दूसरी वजह भी थी जिसने मेरे कामिक के जुनून को उस दिन कई गुणा बढा दिया। मैं पहली बार ऐसे कामिक फैन्स से मिला जिनमे मेरी ही तरह कामिक के लिए बेइतंहा दीवानापन था। यहां मैं रवि यादव का नाम लेना चाहूँगा जो उस भाग्यवादी दिन मुझे वहां मिला था। कामिक्सों के प्रति लोगो का प्यार देखकर मुझ मे और मेरे दोस्त आकाश मे एक नए जोश का संचार हुआ और इस कार्यक्रम से प्रेरित और उत्साहित हो कर हम दोनो ने अपने कामिक संग्रह को बढाने का निश्चय किया।
इससे पहले मेरे पास मुश्किल से 50 या उससे भी कम कामिक्से थी और वो भी सिर्फ ध्रुव की कामिक्से। इस वक्त मे एक बहुत कम वेतन वाली नौकरी कर रहा था। (जिसे मैंने नवम्बर 2008 मे छोड भी दिया था और उसके बाद 2 साल तक बेरोजगार रहा) और कामिक्से भी गिनी-चुनी लेता था। ध्रुव, नागराज की आंतकहर्ता और नागायाण सीरिज। हालांकि उस वक्त और भी अच्छी सीरिजे आ रही थी दूसरे हीरोज की लेकिन पैसे की कमी के चलते उन्हे प्राथमिकता देने मेरे बस की बात नही थी। तो अब ये तो सोच लिया था कि कामिक्से खरीदनी है लेकिन नई कामिक्सें खरीदना अभी हैसियत से बाहर था। तो ये निश्चय किया कि फिलहाल उन कामिक्सों को खरीदा जाए जिनको बचपन मे पढा था और जिनकी वजह से आज हम कामिक्सों पर इतनी चर्चा करने लायक बने। पुरानी कामिक/किताबों के बारे मे सोचते ही ध्यान आया दरियागंज की संडे बुक मार्केट का। मैं साल 2007 मे एक बार इस बुक मार्केट मे आया था और तब देखा था कि कामिक्से भी मिल रही थी। उस वक्त इनकी कीमत भी बहुत साधारण हुआ करती थी। अकसर आधे दाम पर मिल जाती थी। बिना किसी मोल-भाव के। तो मैंने और आकाश ने ये फैसला किया कि हम हर रविवार को मार्केट जाएंगे कामिक खरीदने। और इसका श्री गणेश भी साल 2008 के अंत से पहले हो भी गया।
शुरु मैं हमारी प्राथमिकता सिर्फ राज कामिक ही थी। क्योंकि उस वक्त कामिक खरीदने की मुख्य वजह उन्हे सिर्फ पढना ही था। यहां मैं एक बात बताना चाहूँगा कि मेरा कामिक संग्रहकर्ता बनने का कोई इरादा नही था। मुझे तो उस वक्त ये मालूम भी नही था कि लोग कामिक्सों का भी संग्रह करते है। मुझे 1-2 साल बाद इस बात का पता चला।
शुरुआत मे कामिक्सों की खरीदारी काफी धीमी रही। उसके एक वजह तो पैसे की कमी थी। मैं अपनी नौकरी छोड चुका था। और आगे भी दो साल तक बेरोजगार रहा। दूसरी वजह ये थी कि उस वक्त हम कामिक्से लेने मे बहुत ही नुख्ता-चीनी करते थे। मतलब कि सिर्फ वही कामिक्से ले रहे थे जिन्हे हम पसंद करते थे। यानि कि सिर्फ अपने प्रिय किरदारों की ही कामिक्से ले रहे थे जिनमे राज कामिक्स मे नागराज, ध्रुव आदि की कामिक्से ही मुख्य तौर पर शामिल थी। उस वक्त मनोज, तुलसी, राधा इत्यादि प्रकाशकों की कामिक्से भी मिलती थी लेकिन हमने उस वक्त उन पर कभी ज्यादा ध्यान नही दिया। कभी मन किया या कोई कामिक अच्छी लगी तभी उसे खरीदा वर्ना उन्हे छोड ही दिया। ये सब साल 2008-2009 के बीच हुआ। उस वक्त कामिक्से हम कम ढूंढ पाते थे लेकिन बाकी चीजो की खरीदारी पर ज्यादा पैसे खर्च कर रहे थे।
दरियागंज मे जब ज्यादा सफलता नही मिली तो मैंने अपने घर के आसपास कामिक्सों को तलाशना शुरु किया। किसी जमाने मे नांगलोई मे कामिक्सों की काफी दुकानें हुआ करती थी। और लगभग हर एक बुक डिपो वाले ने कभी ना कभी तो कामिक्से रखी ही थी अपने पास। लेकिन वक्त और तकनीक के साथ कामिक्से अपनी लय बरकरार नही रख पाई और धीरे-धीरे वहाँ कामिक्से दिखनी बंद हो गई। फिर भी मुझे कुछ दुकानों पर उनके मिलने की उम्मीद अभी भी थी। यही सोचकर एक दुकान पर पहुंचा। और वहां तो जैसे मुझे खजाना ही मिल गया। ज्यादातर राज कामिक थी और उन मे से मुझे मेरे प्रिय सुपर हीरो सुपर कमांडो ध्रुव की भी कुछ ऐसी कामिक्से मिल गई जो मैं ढूंढ रहा था। शाम को फोन करके मैंने आकाश को सारी बात बताई और अगले दिन वो भी मेरे घर आ गया कामिक्से लेने। उसने भी काफी सारी कामिक्से उस दुकान से ली। फिर मैंने कुछ और दुकानों पर भी भाग्य को आजमाया और सफलता भी मिली लेकिन बहुत थोडी सी। अब फिर से दरियागंज की तरफ रूख करना पडा। लेकिन अब वहां हमे अपने मतलब की कामिक्से बहुत कम ही मिल पा रही थी। इसलिए अब कामिक्सों को लेकर कुछ ज्यादा उत्साह नही रह गया था दरियागंज मे। ज्यादातर तफरी ही हो रही थी। सुबह पहुंच जाते वहाँ, और हर तरह की दुकान देखकर दोपहर तक वापिस भी आ जाते। और ऐसा साल 2010 के मध्य तक जारी रहा। लेकिन मैंने और आकाश ने दरियागंज जाना बंद नही किया। चाहे गर्मी हो, बारिश हो या सर्दी हो। या फिर 15 अगस्त, 26 जनवरी जैसे बडे अवसरों पर सुरक्षा के तहत बाजार ही क्यों ना बंद हो। हम जाते जरूर थे। बीच मे हमारा दोस्त रवि भी 1-2 बार हमारा साथ देने आया।
अब साल 2010 शुरु हो गया था और हम अपने नए घर मे चले गए थे। अब दरियागंज और भी दूर हो गया था। अब बाजार मे पहुंचने के लिए साईकल, रेल और पैदल यात्रा तीनों माध्यमों का इस्तेमाल हो रहा था। ये समय मेरे लिए काफी मुश्किल भरा था। क्योंकि इतनी मेहनत करने के बाद भी बाजार पहुंचने पर मुझे कुछ नही मिलता था। ऊपर से अब बेरोजगार हुए डेढ साल से ज्यादा हो गए थे और सेविंग भी खत्म होने लगी थी। इन्ही सब के बीच मे 2010 के शुरु के चार 4-5 महीने निकल गए। पैसे खत्म हो रहे थे, जोश दम तोड रहा था, और उम्मीद ना-उम्मीद मे तबदील हो रही थी।
मई का महीना चल रहा था और ऐसे ही खाली निकला जा रहा था। एक रविवार को मैंने आकाश से कहा कि यदि आज भी कोई कामिक बाजार मे नही मिली तो मैं अगले 3-4 रविवार बाजार नही आऊंगा। उसने भी मेरी बात का समर्थन किया। लेकिन जैसे उस दिन भगवान हमे पिछले डेढ साल की कडी मेहनत का फल देने वाला था। बाजार मे थोडा घूमने पर हमे एक जगह बहुत सारी कामिक्से नजर आई। वो भी मिंट कंडिशन मे। राज कामिक्स की बहुत सारी पुरानी कामिक्से जिसमे ध्रुव, नागराज, डोगा, जनरल, आदि सभी तरह की कामिक्से शामिल थी। हमारी तो खुशी का ठिकाना ही नही रहा। कीमत भी बहुत ही साधारण। मात्र 5-10 रु। उस दिन मेरे पास जितने पैसे थे वो सारे कामिक खरीदने मे ही खर्च हो गए। लेकिन हमे ये मालूम नही था कि ये तो सिर्फ शुरुआत है और अगले 1-2 महीने तक हमे इतनी कामिक्से मिलने वाली है कि हमे पैसो की भारी कमी का सामना करना पडेगा। अगले हफ्ते जब हम फिर बाजार पहुंचे तो फिर से वही दुकानदार ढेर सारी कामिक्से लाया था। इस बार उनमे राज के अलावा मनोज, राधा, तुलसी, गोयल इत्यादि दूसरे प्रकाशकों की कामिक्से भी सब एकदम नयी कंडिशन मे। और सोने पर सुहागा ये कि उन कामिक्सों मे से कुछ के अंदर स्टीकर्स भी थे। मेरे पास जितने भी तुलसी कामिक्से के स्टीकर्स है वो सारे यही से ली गई कामिक्सों से है। अब तो जैसे एक नया जुनून सा सवार हो गया बाजार मे आने का। आने वाले 3-4 हफ्ते तक वो बंदा ढेरों कामिक्से लाता रहा और हम भी अपने बजट और जरूरत के हिसाब से कामिक्से खरीदते रहे। इसी बीच मैंने अपने दोस्त विशाल उर्फ बंटी को भी इस बारे मे बता दिया और वो और हमारा एक और दोस्त राहुल भी 1-2 बार कामिक्से लेने के लिए बाजार आए। बंटी को मैं अपने साथ कुछ और दुकानों पर भी लेकर गया और वहां से भी हमने बहुत सारी कामिक्से खरीदी। इसके साथ ही मेरी और आकाश की मुलाकात कुछ और भी कामिक्स प्रेमियों से हुई। आशीष त्यागी, प्रदीप शेहरावत और शाहिद अंसारी। (उस वक्त शाहिद अंसारी हमारे लिए फैन ही थे) इन लोगो के साथ मिलकर भी खूब सारी कामिक्से खरीदी। शाहिद अंसारी हमे एक दुकान पर भी लेकर गए जिसके पास बहुत सारी कामिक्से थी। वहां से मैंने अपने एक फारम के दोस्त अजय ढिल्ल्न के लिए भी बहुत सारी कामिक्से खरीदी। सब 5-10 रुपये मे। इसी बीच मेरे एक्जाम शुरु हो गए। एक्जाम के दिनों मे ही रवि, आकाश और बंटी उस दुकानदार के घर पर भी गए जो रविवार को बाजार मे कामिक्से लाता था और उसके घर से भी उन्होंने काफी कामिक्से खरीदी। बाद मैं फारम का एक और दोस्त (सुप्रतीम) जब अपनी छुट्टी मे दिल्ली आया तो मैंने और आकाश ने उसको बहुत सारी कामिक्से दिलवाई। कुछ तो रविवार बाजार से ही और काफी सारी उस दुकान से जिस पर शाहिद हमे लेकर गया था। इसके अलावा मैंने एक दुकान और ढूंढ ली थी जिस पर हमे काफी कामिक्से मिली। यहां से कामिक्से खरीदने वालो मे मेरे, आकाश और प्रदीप जी के अलावा शाहिद अंसारी भी थे। इस तरह मई से लेकर जुलाई-अगस्त तक कामिक्सों की काफी खरीदारी हुई। लेकिन अब समस्या ये आ गई कि मेरे पास सेविंग लगभग खत्म हो चुकी थी। नागराज जन्मोत्सव 2010 के बाद स्थिति ये आ गई थी कि अब नौकरी करना जरुरी हो गया था। अब दो साल होने वाले थे बिना किसी रोजगार के। नवम्बर 2010 मे एक नौकरी मिल गई और पैसों की चिंता कुछ हद तक खत्म हुई।
साल 2011 की शुरुआत पिछले साल से भी बेहतर रही। इस साल मार्च मे एक दुकानदार के काफी सारी कामिक्से आई थी। लेकिन उनमे से ज्यादातर शाहिद अंसारी ने ही ले ली थी। मुझे थोडी बहुत ही अपनी पसंद की कामिक्से मिली। लेकिन उस दुकानदार ने मुझे बताया कि उसके पास घर पर अभी और भी कामिक्से रखी हुई है। मैंने उसका पता और फोन नम्बर ले लिया और शनिवार को उसके घर गाजियाबाद जा पहुंचा। वहां से मैंने अपनी जिंदगी की अब तक की सबसे ज्यादा कामिक्से एक साथ खरीदी। और वो भी आधे दामों मे। उसके पास ज्यादातर राज कामिक्से ही थी। लेकिन उससे मुझे महारावण सीरिज की काफी सारी कामिक्से एक साथ मिल गई। और इसके साथ ही मुझे कनकपुरी की राजकुमारी भी मिली। साथ ही और भी बहुत सारी नई-पुरानी कामिक्से मिली। वो दिन एक यादगार दिन रहा मेरी जिंदगी का। पहली बार दिल्ली से बाहर जाकर कामिक्से खरीदना वाकई मेरे लिए एक बेहद खास अनुभव रहा। फिर आगे भी उस दुकानदार से बाजार मे ही कामिक्से लेते रहे जब तक कि उसके पास कामिक्से खत्म ना हो गई हो। इसके बाद शायद अगस्त-सितम्बर के बाद एक बार फिर से बहुत सारी कामिक्से बाजार आई। शुरु मे तो वो कामिक्सें हमे जायद दामों (5-10 रुपए) मे मिल गई। लेकिन जब अगले सप्ताह हम उन्ही दुकानदारों पर दुबारा पहुंचे तो सबने कीमत बढा कर बताई कुछ तो प्रिंट पर ही दे रहे थे। हमारे लिए ये पहला ऐसा मौका था जब हम कामिक्से महंगे दामों पर मिल रही थी। हम पुरानी कामिक्से हमेशा 5-10 रुपए मे ही लेते आए थे। अत:एव हमने वो कामिक्से नही खरीदी और उन्हे छोड दिया। बाद मे कामिक्सों के विक्रेताओं ने वो कामिक्से खरीदी। इसके बाद 2011 मे कुछ खास नही हुआ।
2012 मे तो याद भी नही कि कुछ खास हुआ था या नही। सिर्फ कामिक कान याद है। इसके अलावा महफूज भाई से मुलाकात हुई और उन्हे कोबी और भेडिया कामिक दी। साथ ही ध्रुव के कुछ विशेषांक भी महफूज को दिए थे। बदले मे महफूज ने भी मुझे कामिक्से दी। अब संडे मार्किट जाने का भी मन नही करता था। आकाश ने अब मार्किट आना बहुत कम कर दिया था। और मैं ही अकेला आता था। ऐसे ही एक बार 15-20 रुपए मे इंद्रजाल कामिक्से मिल गई थी। तकरीबन 25-35 कामिक्से थी और ज्यादातर अंग्रेजी मे ही थी। एक बार 40 के करीब टिंकल भी मिली थी। पुरानी टिंकल हिंदी और अंग्रेजी मे। 5 रुपए प्रति कामिक। कामिक्से अब कम मिल रही थी लेकिन उनकी कीमते फिर भी काफी नियंत्रण मे थी।
साल 2013 के शुरुआत मे ही मैंने ये मन बना लिया था कि अब ये आखिरी साल है कामिक्से कलैक्ट करने का। शुरुआत ठीक-ठाक रही। अप्रैल मे महफूज भाई का निमंत्रण मिला कि उनके शहर सहारनपुर मे काफी कामिक्से है मेरे लायक। वहां जाकर तकरीबन 1000 रु की कामिक्से खरीदी। सब प्रिंट रेट पर ली। बहुत ही बेहतरीन अनुभव रहा दूसरे शहर मे जाकर कामिक्से खरीदने का। बाद मे इसी महीने सागर राणा जी से भी मुलाकात हुई। वो दिल्ली आए हुए थे। उन्होंने मुझे जम्बू की पहली कामिक सुपर कम्पयूटर का बाप दी। महफूज भी उसी दिन दिल्ली आया और उसने भी उनसे मुलाकात करी। मैंने महफूज को कोहराम कामिक दी और बदले मे उसने मुझे बुद्धिपासा दी। वो दिन भी बहुत खास रहा। आकाश भी उस दिन सागर राणा जी से मिलने बाजार आ गया था। अप्रैल के बाद जुलाई मे मुझे गाजियाबाद वाले बंदे से बहुत सारी तुलसी कामिक्से मिली। सब आधे दाम मे। 250 रुपए मे 59 कामिक्से। जुलाई मे ही मेरी मुलाकात फारम मैम्बर स्पार्की रवि से हुई। उसी दिन मैं अयाज अहमद से भी मिला। फिर उसके अगले ही महीने मे मुझे बहुत सारी मनोज कामिक्से मिली। ज्यादातर विशेषांक ही थे। राम-रहीम, हवलदार बहादुर, क्रुकबांड, कांगा और दूसरे मनोज कामिक्स के किरदारों की तकरीबन 90 के करीब कामिक्से मैंने खरीदी। लेकिन ये खरीदारी अब तक की सबसे महंगी खरीदारी साबित हुई। क्योंकि मैंने हर कामिक के दुगने दाम दिए। यानि कि इस बार और पहली बार मैंने प्रिंट रेट से भी ज्यादा कीमत अदा करी। 10-20 रूपए। और जब मैंने ये फेसबुक पर पोस्ट किया तो एक दोस्त (मोहित शर्मा) को बहुत हैरानी हुई कि पुरानी कामिक्से इतनी महंगी कैसे हो गई? खैर वो कामिक्से खरीदकर मैं आकाश के पास गया और उसने उन मे कुछ कामिक्से ले ली। उस दुकानदार के पास अभी और भी बहुत कामिक्से बच गई थी। तो अगले सप्ताह मैं, आकाश और मोहनीश फिर वहां पहुंचे और आकाश और मोहनीश को अपनी पसंद की कामिक्से मिल गई। मोहनीश उस दिन बहुत खुश था क्योंकि उसकी महारावण सीरिज पूरी हो गई थी। इसके अगले रविवार भी हमने वहां से कुछ कामिक्से और खरीदी।
इसके बाद संडे मार्किट से कुछ नही मिला। फिर नवम्बर-दिसम्बर मे राज कामिक्से ने कामिक फेस्ट इंडिया का आयोजन किया। इस इवेंट मे राज कामिक्स ने पुरानी कामिक्सों का स्टाल लगा रहा था जहां पर 30 रुपए प्रति कामिक की दर से कामिक बेची जा रही थी। मैं ज्यादा कामिक्से नही खरीद सका और जो खरीदी भी उन मे से ज्यादातर उसी दाम पर बाद मे बेच भी दी। कामिक फेस्ट के बाद ही दोस्त की शादी मे नागपुर जाना पडा और वहां से भी थोडी बहुत कामिक्से खरीदी। अब साल का आखिरी महीना चल रहा था और आखिरी महीने के आखिरी रविवार मैं पूरा दिन वही मार्किट मे ही घूमता रहा। जैसे उस जगह से जुडी हुई सारी पुरानी यादों को इकट्ठा कर रहा था।
साल 2014 मे मैं दरियागंज काफी कम गया। अगर गया भी तो कामिक्स खरीदने के इरादे से नही और ज्यादातर शाम के वक्त ही गया। साल 2008 से 2013 तक मैंने काफी कामिक्से खरीदी और अब तो ऐसा लगता है कि हमने काफी अच्छे समय मे कामिक्सों का सग्रंह बनाया। आज के दौर मे तो मेरे लिए ये बिल्कुल ही नामुमकिन होता। फिलहाल मेरे संग्रह मे 2400 से ज्यादा कामिक्से है। हिंदी, अंग्रेजी, नई, पुरानी, ओरिजिनल, रिप्रिंट्स सब तरह की मिलाकर। सबसे ज्यादा कामिक्से राज कामिक्स की ही है। इसके अलावा स्टीकर्स, ट्रेडिंग कार्डस, पोस्टर और दूसरे तरह की कामिक्सों से जुडी हुई चीजो का भी अच्छा खासा क्लैक्शन है। काफी खुशी होती है अपना कामिक संग्रह देखकर। उसकी दो खास वजह है। पहली तो ये कि मैंने अपना कामिक क्लैक्शन बहुत ही मेहनत, ईमानदारी और किफायती कीमत पर बनाया है। इसमे जिन दोस्तो ने मदद करी उनका नाम मैं इस लेख मे लिख चुका हूँ। कोई रह गया है तो उसके लिए माफी चाहूँगा। कामिक संग्रह करते समय कभी भी कालाबाजारी को बढावा नही दिया। कभी ऊंचे दाम पर कामिक्से नही खरीदी। दूसरी वजह यह है कि मैं बचपन से ये चाहता था कि मेरे आस-पास ढेर सारी कामिक्से हो। अब जब अपनी अलमारी या अपन दिवान खोलकर देखता हूं तो पाता हूं कि जितना मैंने बचपन मैं सोचा था अब उससे कही गुना ज्यादा कामिक्से मेरे पास है। ये एक सपने को जीने के जैसा ही है।
मेरे कामिक संग्रह की एक और विशेषता ये भी है कि मेरे पास सबसे ज्यादा कामिक्से राज कामिक्स ही है लेकिन मेरे पास उनके किसी भी बडे किरदार की सारी कामिक्से नही है। यहां तक कि मेरे प्रिय पात्र सुपर कमांडो ध्रुव की भी मेरे पास सारी कामिक्से नही है। जबकि मनोज के 3-4 किरदारों की सारी कामिक्से मेरे पास है। 
wink emoticon
2008 से शुरु हुई मेरी कामिक की इस जुनूनी यात्रा के दौरान मुझे भारतीय कामिक जगत और कामिक क्लचर के बारे मे बहुत सी बाते जानने को मिली। बहुत से चित्रकारों और लेखकों से भेट हुई। काफी सारे कार्यक्रमों का हिस्सा बना। खासतौर से नागराज जन्मोत्सव और बुक फेयर। जहां तक मुझे याद है 2009 के बाद से ये पहला अवसर था जब इस साल मे अगस्त-सितम्बर बुक फेयर नही गया। काफी दोस्त बने और सब के साथ बहुत ही अदभुत अनुभव सांझा किए।
तो ये थी मेरे कामिक संग्रह की कहानी। कैसे शुरु हुआ, कहां से शुरुआत हुई, कैसे प्रगतिशील हुआ और कैसे अंत हुआ। कामिक क्लैक्ट करने का सफर तो साल 2013 मे खत्म हो गया। लेकिन कामिक पढने का शौक अभी भी जारी है। अब कामिक्सों पर ज्यादा चर्चा नही कर पाता लेकिन राज कामिक्स के नए सैट और नए प्रकाशकों की कामिक्से खरीदना और पढना अभी भी जारी है। और उम्मीद करता हूं कि जैसे पिछले 21 सालों से कामिक्से पढता आया हूँ वैसे ही आगे भी पढता रहूंगा।
जुनून।

Saturday, April 25, 2015

Comic Fan Fest # 03 (19 April, 2015)

Comic Fan Fest # 03 (19 April, 2015)
दिल्ली में आयोजित कॉमिक फैन फेस्ट अप्रैल 2015 धमाकेदार इवेंट का हिस्सा बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। एक के बाद एक इतना सब था इस इवेंट में कि समय का पता ही नहीं चला जिसके लिए एक बार फिर से दीपक चौहान, आकाश मोहनीश बधाई के पात्र है। बैज, केक, गिफ्ट्स आदि में काफी बारीकी से सोचा गया और सोच को मूर्त रूप देने के लिए हफ्तों की मेहनत की गयी। राज कॉमिक्स पर आकाश द्वारा बनायीं गयी एंड्राइड एप, मेहमान कलाकारों द्वारा बनाये गए चित्र बेहतरीन थे। प्रदीप शेरावत जी, जगदीश कुमार जी और जय खोहवाल भाई के अलावा इस बार ललित शर्मा जी ने आयोजन की रौनक बढ़ाई। मैं धनंजय, अभिमनु, आयुष और नितिन मुंजाल जी से पहली बार मिला। लोकेश, संजय और अयाज़ ने मुझे कॉमिक्स, किताबें और पोस्टर गिफ्ट में दिए । इस अवसर पर मेरी लिखी शार्ट फिल्म बावरी बेरोज़गारी भी आयोजको के सौजन्य से चली। शिवांक द्वारा विभिन्न हस्तियों की मिमिकरी और आयुष का एक्ट मनोरंजक थे। बीच में सभी के अलग-अलग मुद्दो पर गंभीर पर रोचक संवाद हुए। सदाबहार रवि भाई और शुभांकित बिना मंच पर आये ही अपनी बातों-कमेंट्स से सबका मनोरंजन कर रहे थे।
Ravi Yadav, Jai Khohwal and Pradeep Sherawat
अंत में यही कहूँगा कि यह आयोजन पिछले वर्ष दिसंबर कॉमिक फैन फेस्ट के आयोजन से बेहतर था, आगे यह उम्मीद करता हूँ कि कॉमिक फैन फेस्ट और बड़े स्तर पर पहुँचे, सदस्यों एवम आयोजको की मेहनत और योजनाएँ देखकर लगता है ऐसा ज़रूर होगा।
- मोहित शर्मा (ज़हन) 

Wednesday, April 8, 2015

ICF Community FB Updates

*) - Article on Cartoonist काक (Kaak)

*) - 9 Indian Comics We Found At Comic Con With Mythology, Sci-Fi, Humour And More (By Gayathri Naga for Polkacafe.com)
What comes to your mind when we say Indian comics? Maybe the witty Chacha Choudhry? The Tinkle Digest that you read as a kid on train journeys? Or perhaps it's the good old Amar Chitra Katha. Indian comics are so much more than these few names. With an interesting blend of mythology, sci-fi and everyday concerns – Indian comics are back with a bang! Here is a list of Indian comics that every comic lover must read. Read Full Article - http://www.polkacafe.com/indian-comics-from-comic-con-2015-1149.html


*) - Legendary author, cartoonist, journalist & environmentalist 79 years young Mr. Aabid Surti, recipient of the 5th Comic Con India Lifetime Achievement Award ‪#‎comics‬ ‪#‎india‬ ‪#‎aabid_surti‬


*) - Artist - Mitali Panganti