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Monday, May 6, 2024

Reviving Indian Comics Heritage: The Return of Angara

 Iconic superhero Angara is making a comeback in the Indian comic book scene, thanks to the efforts of Comics India. Tulsi Comics, a beloved publisher from Meerut, India, had introduced Angara along with other notable characters like Jambu, Tausi, Baaz during the 1990s and early 2000s. However, with the passage of time, Tulsi Comics became defunct. Now, with the acquisition of character and distribution rights (disputed by other active publishers), Comics India is breathing new life into Angara with the launch of Angara 2.0. This new series promises to continue the adventures of the beloved superhero while introducing fresh storyline and modernized artwork, covers to captivate both old fans and a new generation of readers.

The announcement of Angara 2.0 in paperback format comes with exciting details. The comic boasts a larger size and premium quality, comprising 40 pages of action-packed content. With two cover page art options available, readers can choose the version that resonates most with them. Additionally, a 10% discount offer further sweetens the deal, making it an irresistible opportunity for comic book enthusiasts.

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Thursday, April 13, 2017

Interview with Superfan Supratim Saha

नागपुर में रह रहे सुप्रतिम साहा का नाम भारतीय कॉमिक्स प्रेमियों के लिए नया नहीं है। सुप्रतिम भारत के बड़े कॉमिक्स कलेक्टर्स में से एक हैं, जो अपने शौक के लिए जगह-जगह घूम चुके हैं। कहना अतिश्योक्ति नहीं, ऐसे सूपरफैंस की वजह से ही भारतीय कॉमिक्स उद्योग अभी तक चल रहा है। पहले कुछ कॉमिक कम्युनिटीज़ में इनका अभूतपूर्व योगदान रहा और समय के साथ ये अपने काम में व्यस्त हो गए। हालांकि, अब भी कुछ कॉमिक्स ग्रुप पर सुप्रतिम दिख जाते हैं। ये मृदुभाषी और सादा जीवन व्यतीत करने में विश्वास करते हैं, इनके बात करने और वाक्य गढ़ने का तरीका मुझे बहुत भाता है इसलिए साक्षात्कार के जवाब में मेल से भेजे इनके जवाबों को जस का तस रखा है। 

अपने बारे में कुछ बताएं?
सुप्रतिम - 80 के दशक में भारत के पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा में मेरा जनम हुआ। मैने अपनी स्कूलिंग अगरतला शहर से की। मैने इंजिनियरिंग की नागपुर शहर से और बॅंगलुर शहर मे कुछ टाइम जॉब करने के बाद मैने मास्टर्स की चेन्नई शहर मे, आज मैं नागपुर के एक कॉलेज मे वाइस प्रिन्सिपल के पद पे काम कर रहा हू. आज भी मैं रेगुलार कॉमिकस खरीदता हू और पढ़ता हु्। मुझे मालूम हैं मेरा यह जुड़ाव कॉमिक्स के साथ हमेशा  रहेगा. इस सफ़र मे मैं अपने कुछ दोस्तो का नाम लेना चाहूँगा जिन्होने हमेशा मेरा साथ निभाया, बंटी फ्रॉम कोलकाता, संजय आकाश  दिल्ली से, गुरप्रीत पटियाला से, और बहत सारे दोस्त, वरुण ,मोहित, महफूज़ ,ज़हीर,विनय,अजय ढिल्लों  जिन्हे मैं ऑनलाइन मिला और इन सब से भी मेरी काफ़ी अच्छी दोस्ती हैं। सबके नाम शायद मैं यहा लिख नही पाया पर  मैं सबका आभारी हूँ जिन्होने इस सफ़र पे मेरा साथ निभाया। 

कॉमिक्स कलेक्शन का आपका सफर कैसे शुरू हुआ?
सुप्रतिम - मेरे कॉमिक्स पढ़ने की अगर बात करे तो ये शुरुवात हुई थी 1991-92 के आसपास। उन दिनों मैं क्वार्टर में रहता था और हर एक  घर से बटोर के जो कॉमिक्स मुझे मिलते थे उनमे से ज़्यादा तर या तो टिनटिन होते थे या फिर इंद्रजाल कॉमिक्स।  हिंदी कॉमिक इंडस्ट्री से मैं जुड़ा 1994 में जब मेरे एक राजस्थानी मित्र ने मुझे दो कॉमिक्स दी, वो दो कॉमिक्स थे डॉ नो और उड़ती मौत। राज कॉमिक्स और साथ ही अन्य हिंदी  कॉमिक्स के साथ मैं इन्ही दो कॉमिक्स की वजह से जुड़ा। 

अब तक कॉमिक्स के लिए कहाँ-कहाँ घूम चुके हैं?
सुप्रतिम - कॉमिक्स के लिए ट्रेवल करना मैंने शुरू किया सन 2009 से, यह वो समय था जब मैं बैंगलोर में था.बैंगलोर के अनिल बुक शॉप से बहत सारी कॉमिक्स मैंने रिकलेक्ट की.इसको छोड़के मैंने सबसे ज़्यादा कॉमिक्स कलेक्ट की नागपुर से। इस शहर ने मुझे ऑलमोस्ट 1500 + कॉमिक्स दी जिनमे मैक्सिमम दुर्लभ कॉमिक्स थे। इन 8 सालो में मैंने दिल्ली, नागपुर, कोलकाता, हैदराबाद, बैंगलोर, चेन्नई, पटियाला, अम्बाला, अगरतला जैसे शहरो से भी कॉमिक्स ली। दिल्ली शहर में दरीबा कलां के गोडाउन  से भी मैंने 1000+ कॉमिक्स ली।  इन दो शहर को छोड़के हैदराबाद शहर में भी मुझे 300+ विंटेज डायमंड कॉमिक्स मिलें। ऐसी कॉमिक्स जो की 35 साल से भी अधिक पुराने हैं,जैसे की लंबू मोटू ,फौलादी सिंह ,महाबली शाका ,मामा भांजा और वॉर सीरीज वाली कॉमिक्स। इन सब को छोड़के मेरे पास बंगाली कॉमिक्स भी है भारी संख्या में, करीबन 500 ,जिनमे पिछले 60-80 साल पुराने कॉमिक्स भी हैं। मैं आज भीं रेगुलर कॉमिक्स लेता हु हिंदी बंगाली इंग्लिश में। 

पहले के माहौल और अब में क्या अंतर दिखते हैं आपको?
सुप्रतिम - पहले के माहौल में कॉमिक्स एक कल्चर हुआ करता  था, आजकल कॉमिक्स तो दूर की बात हैं किताबों को पढ़ने के लिए भी पेरेंट्स बच्चो को प्रोत्साहित नहीं करते।  विडियो गेम्स केबल टीवी आदि तो मेरे बचपन में भी आराम से उपलब्ध थे ,पर इन सबके बावजूद अगर हर दिन खेलने नहीं गए, तैराकी नहीं की तो घर पे डांट पड़ती थी। आजकल कॉमिक्स,खासकर के कोई भी "रीजनल " फ्लेवर की कॉमिकस को पढ़ना लोगो के सामने खुदको हास्यास्पद करने जैसा हैं। यही वजह हैं की सिर्फ वही लोग देसी कामिक्से पढ़ते हैं जिनमे रियल पैशन हैं, वरना मंगा और वेस्टर्न कॉमिक्स को ही सीरियस कॉमिक्स समझने और ज़ाहिर करने वालो की भी कमी नहीं हैं। एक कॉमिक बुक फैन होने के नाते मुझे सभी कामिक्से देसी  या विदेसी  अच्छे  लगते  है पर भाषा के नाम पे यह भेदभाव आज बहत ज़्यादा प्रभावशाली हैं। 

अपने शहर के बारे में बताएं।
सुप्रतिम - मेरा जन्म भारत के पूर्वोत्तर मे स्थित अगरतला शहर मे हुआ। गौहाटी के बाद ये पूर्वोत्तर के सात राज्यो मे दूसरा प्रमुख शहर भी हैं। बॉर्डर से सटे होने की वजह से यहा बीएसएफ भी कार्यरत हैं जिनमे से काफ़ी लोग हिन्दी भाषी है। साथ ही साथ ओ एन जी सी होने के कारण से हिन्दी भाषी लोग काफ़ी मात्रा मे मौजूद भी है। ज़ाहिर सी बात हैं की इस वजह से हिन्दी कॉमिक्स शुरू से ही यहा रहते लोगो का मनोरंजन करती आ रही हैं. समय के साथ साथ हिन्दी कॉमिक्स का क्रेज़ यहा काफ़ी कम हो चुका हैं पर आज भी मैं घर जाता हू तो भूले भटके एक आधा दुकान मे कुछ दुर्लभ कॉमिकसे खोज ही निकलता हूँ। 

आप अक्सर स्केच बनाते हैं, स्केचिंग का शौक कब लगा?
सुप्रतिम - स्केचिंग का  शौक  मुझे कॉमिक्स से नही  लगा। उन दिनो (1993) जुरासिक पार्क फिल्म का क्रेज़  सबके सिर चढ़के बोल रहा था , मेरे घर पे एक किताब थी जिसका नाम था "अतीत साक्षी फ़ॉसिल" उस किताब मे डाइनॉसॉर के बारे मे जानकारियाँ थी और अनूठे चित्र थे, मैं दिन भर उन्ही के चित्र कॉपी करने के कोशिश मे लगा रहता था। कुछ एक बार जब मेरे इन प्रयासो को लोगो ने मुर्गी,बतक के चित्र के रूप मे शिनाख्त की तो मैं फिर कॉमिक स्टार्स के चित्र बनाने लगा। बचपन मे सबसे ज़्यादा चित्र मैने भेड़िया के बनाए (प्री-1997) ,नागराज के चित्र बनाते हुए मैं काई बार पढ़ाई के वक़्त पकड़ा भी गया। आज कल समय मिलता नही हैं पर उत्सुकता पहले जैसी ही हैं।

आपके हिसाब से एक अच्छी कॉमिक्स के क्या मापदण्ड हैं? 
 सुप्रतिम - एक अच्छी  कॉमिक्स का मापदंड किसी एक विषय पे निर्भर नहीं करता, पर पहला मापदंड यह हैं की उसके चित्र और कहानी में से कोई भी एक पहलु जोरदार होनि चाहिये। हालाकी चित्र अव्वल दर्जे का हो तो सबसे पहले ध्यान आकर्षित करता है। पर ऐसे कॉमिक भी होते हैं जिनमे चित्र का योगदान कम होता है और कहानी इतनी ज़बरदस्त होती है की दिल को छु जाती हैन.जैसे की "अधूरा प्रेम".वैसे ही काफ़ी ऐसे कॉमिक्स भी होते हैं जिनके साधारण से कहानी को
चित्रकला के वजह से एक अलग ही आकर्षण मिलता हैन. मनु जी के द्वारा बनाए गये सभी परमाणु के कॉमिक्स इस श्रेणी मे आते हैं. आज भी अगर कॉमिक्स के क्वालिटी की बात आए तो आकर्षक चित्रकला ही वो प्रमुख माध्यम हैं जिससे आप एक कॉमिक्स से प्रभावित होते हैं। 

अपनी पसंदीदा कॉमिक्स, लेखक, कलाकार और कॉमिक किरदारों के बारे में बताएं। 
सुप्रतिम - मेरी पसंदीदा कॉमिक्स, किरदार के हिसाब से देखा जायें तो  होंगे ग्रांड मास्टर रोबो, ख़ज़ाना सीरीज़, भूल गया डोगा, टक्कर, खरोंच, 48 घंटे सीरीज़, लाश कहा गयी, चमकमणी, महारावण सीरीज़, अग्नि मानव सीरीज़, प्रोफ शंकु सीरीज़ आदि। अनुपम सिन्हा जी ,सत्यजीत राय,संजय जी मेरे प्रिय लेखक मे से हैं। प्रताप जी,अनुपम जी, मनु जी, डिगवॉल जी, ललित शर्मा जी, चंदू जी, सुजोग ब्न्दोपध्यय जी, अभिषेक चटेर्ज़ी, मलसुनी जी, मयुख चौधरी जी,गौतम कर्मकार
जी मेरे प्रिय कलाकार हैं।  ध्रुव, नागराज, परमाणु, डोगा, भेड़िया, प्रोफेसर शंकु, कौशिक, फेलूदा, महाबली शाका,फॅनटम, घनादा मेरे फ़ेवरेट क़िरदार हैं। 

बचपन की कोई हास्यास्पद घटना, याद बांटिये। 
सुप्रतिम - बचपन मे मेरे एक राजस्थानी मित्र राकेश कुमार मीना ने मुझे पहली बार राज कॉमिक से अवगत कराया। उसीके साथ हुआ एक वाक़या मुझे याद हैं जिसे हास्यास्पद घटना कहा जा सकता हैं। राकेश और मेरे पास जितनी भी कॉमिकस थी, उनको हम एक्सचेंज करके पढ़ते थे। एक बार हुआ यह की मुझे उससे दो कॉमिक से लेनी थी, जिनमे से एक थी इंद्र की और दूसरी थी ताउजी कि, अब हुआ यह की यह दोनो कॉमिक आठ रुपये के थे। जब मैने उसे अपने दो कॉमिकसे दी तो उसने मुझे कहा की तेरे दो कॉमिक्सो का मूल्य पन्द्रह रुपये हैं तो मैं तुझे मेरे दो कॉमिक, जो की सोलह रुपये के हैं, तुझे नही दे सकता। उसके इस बिज़नेस माइंडनेस की जब भी कल्पना करता हू तो आज 22 साल बाद यह घटना हास्यास्पद ही लगता हैं। दूसरी घटना भी 1995 की ही हैं, मैं अपने फॅमिली के साथ जा रहा था बन्गलोर्, हम कलकत्ता  मे ठहरे हुए थे और मशहूर कॉलेज स्ट्रीट से होके गुज़र रहे थे की मुझे एक दुकान मे कॉमिकस दिखि। मेरे कहने पे पापा ने मुझे दो कॉमिकसे दिलवाई, एक थी “बौना शैतान” और दूसरी “ताजमहल की चोरिं “मुझे हैरत हुई जब दुकानदार ने पापा से 6 ही रुपये माँगे, और मुझे पहली बार मालूम पड़ा की सेकेंड हॅंड बुक्स किसे कहते है। बचपन के यह मासूम किससे सही मायने मे हास्यास्पद ना सही,होठों पे मुस्कान ज़रूर लाती हैं। 

बदलते समय के अनुसार कॉमिक्स प्रकाशकों को क्या सलाह देना चाहेंगे?
सुप्रतिम - देसी कॉमिक्स के दौर को मैं कूछ किस्म मे बाँटना चाहूँगा. 1940-1970 के दशक मे बंगाल मे वीदेसी कॉमिक्स के अनुकरण मे काफ़ी विकसित कॉमिकस बनी, जिनमे सायबॉर्ग जैसे कॉन्सेप्ट्स काम मे लाए गये। 1970 से हिन्दी कॉमिक इंडस्ट्री मे भी सहज सरल चित्रो के साथ कॉमिकसे आई। 1980 से कॉमिकसे काफ़ी विकसित हो गई और 1990-2000 तक हिन्दी कॉमिक इंडस्ट्री का सुनेहरा दौर रहा। 2000 के बाद की बात करें तो डिजिटल फॉरमॅट्स के बदौलत हिन्दी कॉमिक इंडस्ट्री मे काफ़ी चेंजस आयें। आज भी कुछ कॉमिक्स मे जैसे की बंगाली कॉमिक्स इंडस्ट्री मे मैनुअल कलरिंग का प्रयोग बखूबी से किया जाता हैं। समय के साथ कुच्छ इंडस्ट्रीस बदल गये और कूछ ने अपना पुराना स्टाइल बरकरार रखा, पर एक अच्छी कॉमिक्स को आज भी फैंस जैसे  भाँप लेते है। बदलते समय में स्टाइल बदला होगा पर अच्छे कॉमिक्स का मापदंड वही हैं जो पहले से थे। प्रकशको से मेरी बीनति रहेगी की यह पॅशन ही हैं जो एक कॉमिक को आकर्षक बनाती हैं ना की नयी तकनीक. कॉमिक बनाते वक़्त उन मौलिकताओ का ध्यान रखे जिनकी वजह से कॉमिक्स ने हमारे बचपन को इतने रंगो मे रंगा। 

कॉमिक्स पाठकों के लिए आपका क्या सन्देश है?
सुप्रतिम - कॉमिक्स पाठक बंधुओ के लिए मैं यही बोलना चाहूँगा की आप मे से काफ़ी लोग अभी किसी कारणवश कॉमिक्स से दूर होते जा रहे हैं, कोशिश  करिए की अपने आनेवाले पीढ़ी को आप प्रोत्साहित करे कॉमिक्स पढ़ने के लिए और खुद भी पढ़ें और खरीदें। 

- मोहित शर्मा ज़हन

Monday, August 8, 2016

भारतीय कॉमिक्स फैन के प्रकार (भाग #1)

किसी व्यक्ति, उत्पाद या उद्योग के प्रशंसक कई प्रकार के होते हैं और अनेको लोगो की रोज़ी-रोटी फैन्स पर निर्भर होती है। हर जगह की तरह फैन के पॉजिटिव/नेगेटिव पहलु होते हैं। आज हम भारतीय कॉमिक्स के तरह-तरह के प्रशंसकों के बारे में बात करेंगे। संभव है कि फैन्स खुद को एक से अधिक श्रेणी में पाएं, तो शुरू करते हैं।

बरसाती फैन: ऐसे फैन हाल की किसी घटना, फिल्म, टीवी सीरीज से प्रेरित होकर कॉमिक्स कम्युनिटी में जोश के साथ आते हैं। बड़े उत्साह के साथ "तिरंगा कैप्टन अमेरिका की कॉपी है", "डायमंड कॉमिक्स में डीसी वाली बात नहीं", जैसे स्टेटमेंट देते हैं। फिर अचरच में पड़ते हैं कि रेस्पॉन्स क्यों नहीं मिल रहा। यहाँ जमे Indian Comics के पुराने फैन्स इस अचरच में होते हैं कि 2 दशक पहले याहू चैट, रैडिफ मेल से चले आ रहे सवाल कुकुरमुत्ता प्रशंषको को नए कैसे लग सकते हैं? खैर अक्सर कम्युनिटी, ग्रुप्स के अन्य सदस्यों से बॉन्डिंग न होने के कारण ऐसे मित्र 1 हफ्ते से लेकर 6 महीनो के अंदर हमेशा के लिए संन्यास ले लेते हैं। इस बीच इनके सोशल मीडिया पर कुछ कॉमिक्स प्रेमी मित्रों का जुड़ना इनके लिए बोनस है।

आई, मी और मैं फैन: ओहो भाई साहब! ये लोग किसी के फैन हों ना हों अपने सबसे बड़े फैन होते है। इनके शरीर में आत्ममुग्धता का हॉर्मोन अलग से सीक्रीट होता है। कम्युनिटी, ग्रुप या असल जीवन में ये लोग बस अपने बारे में बातें और अपना प्रमोशन करने में लगे रहते हैं। देखो मेरा गोपीनाथ मुंडे, भैंस के लुंडे हार्डकवर कलेक्शन, देखो मैं उल्टा आइस क्रीम कोन खा रहा, देखो मेरा दादी माँ के नुस्खे वाला पेज (जिसका कॉमिक से कोई सरोकार नहीं पर ढाई सौ रुपये देकर हज़ार लाइक करवा लिए हैं तुम्हे जलाने को), देखो मुझे बैंगनी कुतिया ने काट लिया, हम किन्नौर के शहज़ादे अभी फॉलो करो। कॉमिक्स से जुडी कोई अपडेट इनसे ना के बराबर गलती से निकलती है या तब निकलती है जब इन्हें अपना कुछ प्रमोट करना हो।

वेटरन फैन: ये फैन बरसाती फैन्स के विलोम होते हैं। व्हाट्सएप्प, फेसबुक, ट्विटर फलाना हर जगह अगर कॉमिक से जुड़ा कोई समुदाय बनता है तो इन्हें बाय डिफ़ॉल्ट उसमे शामिल कर लिया जाता है। हालांकि, वर्षों से सक्रीय रहने की वजह से इनमें पहले की तरह भयंकर जज़्बा तो नहीं रहता पर फिर भी इनकी एक्टिविटी दिख जाती है। कुछ प्रशंसक कॉमिक्स कम्युनिटी को बढ़ाने और अन्य जुडी बातों में इतना योगदान दे डालते हैं कि एक समय बाद इन्हें किसी क्रिएटिव जैसी इज्जत मिलने लगती है। ये जब किसी कॉमिक इवेंट में जाते है तो कई लोग इन्हें आसानी से पहचान लेते हैं। समय के साथ कई वेटरन सन्यासी हो जाते हैं पर फिर भी इनके काम की वॉल्यूम इतनी होती है कि इनका नाम गाहे-बगाहे आता ही रहता है।

नकली वेटरन फैन: वैसे इनके खाते में बड़ा योगदान या कोई नोटेबल काम नहीं होता फिर भी इनका बहुत नाम होता है। आम जनता इन्हें वेटरन सा ही सम्मान देती है। ये फैन्स कभी बरसाती हुआ करते थे जिन्होंने संन्यास तो नहीं लिया पर अब 4 महीनो में एक बार कॉमिक्स पर डेढ़ पैराग्राफ वाला कमेंट या अपडेट मार कर समझ लेते हैं कि इनका धर्म निभ गया। इस Recurring डेढ़ पैराग्राफ और कभी-कभार के लाइक से धीरे-धीरे कम्युनिटी को इनका नाम याद हो जाता है और ये बड़े कॉन्फिडेंस से वेटरन श्रेणी की सीट झपट लेते हैं। कुछ ग्रुप के तो ये गुडविल एम्बेसडर तक बन जाते हैं फ्री-फण्ड में।

येड़ा बनके पेड़ा खाने वाले फैन: कुछ लोग मृदुभाषी, "भोले-भाले मगर गज़ब के चालाक फाइटर दोस्त" होते हैं। उदाहरण के तौर पर बड़ी कम्युनिटी के कई सदस्यों से छोटे-छोटे फेवर लेते हुए अपना बड़ा करना...कलेक्शन! ताकि किसी पर बोझ भी ना पड़े और हमारा छप्पर भी फट जाए। इतना ही नहीं अपनी बातों से कलाकारों, प्रकाशकों पर डालडा की इतनी परत चुपड़ देते हैं कि समय-समय पर इन्हें कुछ ख़ास गिफ्ट्स, प्राइज आदि स्पेशल ट्रीटमेंट मिलते रहते हैं। समय बीतने के साथ ये लोग अपने किरदार में टाइपकास्ट और कॉमिक कम्युनिटी में बदनाम हो जाते हैं इसलिए नए शिकार पकड़ते हैं।

कॉमिक प्रशंसकों की कुछ और श्रेणीयां अगले भाग में....

- मोहित शर्मा ज़हन